मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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१०८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां-
स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥
यह आत्मा बलहीन पुरुषको प्राप्त नहीं हो सकता और न प्रमाद अथवा लिङ्ग (संन्यास) रहित तपस्यासे ही [मिल सकता है]। परंतु जो विद्वान् इन उपायोंसे [उसे प्राप्त करनेके लिये] प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा ब्रह्मधाममें प्रवेश करा देता है ॥ ४ ॥
| यस्मादयमात्मा बलहीनेन बलप्रहीणेनात्मनिष्ठाजनितवीर्यहीनेन न लभ्यो नापि लौकिकपुत्रपश्वादिविषयसङ्गनिमित्तप्रमादात् , तथा तपसो वाप्यलिङ्गाल्लिङ्गरहितात् । तपोऽत्र ज्ञानम्; लिङ्गं संन्यासः। संन्यासरहिताज्ज्ञानान्न लभ्यत इत्यर्थः । एतैरुपायैर्बलाप्रमादसंन्यासज्ञानैर्यतते तत्परः संन्प्रयतते यस्तु विद्वान्विवेक्यात्मवित्तस्य विदुष एष आत्मा विशते संप्रविशति ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥ | यह आत्मा बलहीन अर्थात् आत्मनिष्ठाजनित शक्तिसे रहित पुरुषद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है; न लौकिक पुत्र एवं पशु आदि विषयोंकी आसक्तिके कारण होनेवाले प्रमादसे ही मिल सकता है और न लिङ्गरहित तपस्यासे ही । यहाँ तप ज्ञान है और लिङ्ग संन्यास । तात्पर्य यह कि संन्यासरहित ज्ञानसे प्राप्त नहीं होता । जो विद्वान् यानी विवेकी आत्मवेत्ता तत्पर होकर बल, अप्रमाद, संन्यास और ज्ञान—इन उपायोंसे [उसकी प्राप्तिके लिये] प्रयत्न करता है उस विद्वान्का यह आत्मा ब्रह्मधाममें सम्यक् रूपसे प्रविष्ट हो जाता है ॥४॥ |
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