मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
| संसारिणोऽन्ये जायन्ते ।<br><br>“योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः···”<br><br>(मनु० १।७) इत्यादिसमृतेः ।<br><br>विश्वस्य सर्वस्य जगतः कर्तोत्पादयिता । भुवनस्योत्पन्नस्य गोप्ता पालयितेति विशेषणं ब्रह्मणो विद्यास्तुतये । स एवं प्रख्यातमहत्त्वो ब्रह्मा ब्रह्मविद्यां ब्रह्मणः परमात्मनो विद्यां ब्रह्मविद्यां 'येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्' (मु०उ० १।२।१३) इति विशेषणात्परमात्मविषया हि सा ब्रह्मणा वाग्रजेनोक्तेति ब्रह्मविद्या तां सर्वविद्याप्रतिष्ठां सर्वविद्याभिव्यक्तिहेतुत्वात्सर्वविद्याश्रयामित्यर्थः; सर्वविद्यावेद्यं वा वस्त्वनयैव विज्ञायत इति,<br><br>“येनाश्रुतं श्रुतं भवति अमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्” (छा० उ० ६।१।३) इति श्रुतेः । | [ वह परमात्मा स्वयं उत्पन्न हुआ ]"<br>इत्यादि स्मृतिके अनुसार वह, जैसे अन्य संसारी जीव उत्पन्न होते हैं उस तरह धर्म या अधर्मके वशीभूत होकर उत्पन्न नहीं हुआ ।<br><br>'विश्व अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का कर्ता—उत्पन्न करनेवाला तथा उत्पन्न हुए भुवनका गोप्ता—पालन करनेवाला' ये ब्रह्माके विशेषण [ उसकी उपदेश की हुई ] विद्याकी स्तुतिके लिये हैं । जिसका महत्त्व इस प्रकार प्रसिद्ध है उस ब्रह्माने ब्रह्मविद्याको—ब्रह्म यानी परमात्माकी विद्याको, जो 'जिससे अक्षर और सत्य पुरुषको जानता है' ऐसे विशेषणसे युक्त होनेके कारण, परमात्मसम्बन्धिनी ही है अथवा अग्रजन्मा ब्रह्माके द्वारा कही जानेके कारण जो ब्रह्मविद्या कहलाती है उस ब्रह्मविद्याको, जो समस्त विद्याओंकी अभिव्यक्तिकी हेतुभूत होनेसे, अथवा “जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, मनन न किया हुआ मनन हो जाता है तथा अज्ञात ज्ञात हो जाता है” इस श्रुतिके अनुसार इसीसे सर्वविद्यावेद्य वस्तुका ज्ञान होता है, इसलिये जो सर्वविद्याप्रतिष्ठा यानी सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रयभूता है, अपने ज्येष्ठ पुत्र |