भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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. खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७


मग्राहकं चातो नित्यम् अविनाशि। विभुं विविधं ब्रह्मादि-स्थावरान्तप्राणिभेदैर्भवति इति विभुम्। सर्वगतं व्यापकमाकाश-वत्सुसूक्ष्मं शब्दादिस्थूलत्व-कारणरहितत्वात् । शब्दादयो ह्याकाशाव्वादीनामुत्तरोत्तरं स्थूलत्यकारणानि तदभावात् सूक्ष्मम्। किं च तदव्ययमुक्तधर्म-त्वादेव न व्येतीत्यव्ययम् । न हि अनङ्गस्य स्वाङ्गापचयलक्षणो व्ययः सम्भवति शरीरस्येव। नापि कोशा-पचयलक्षणो व्ययः सम्भवति राज्ञ इव । नापि गुणद्वारको व्ययः सम्भवत्यगुणत्वात्सर्वात्म-कत्वाच्च ।और अग्राहक भी है, इसलिये वह नित्य—अविनाशी है। तथा विभु—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त प्राणि-भेदसे वह विविध (अनेक प्रकारका) हो जाता है, इसलिये विभु है, सर्वगत—व्यापक है और शब्दादि स्थूलताके कारणोंसे रहित होनेके कारण आकाशके समान अत्यन्त सूक्ष्म है; शब्दादि गुण ही आकाश-वायु आदिकी उत्तरोत्तर स्थूलताके कारण हैं, उनसे रहित होनेके कारण वह [ अक्षरब्रह्म ] सुसूक्ष्म है। तथा उपर्युक्त धर्मवाला होनेसे ही कभी उसका व्यय (ह्रास) नहीं होता इसलिये वह अव्यय है; क्योंकि अङ्गहीन वस्तुका शरीरके समान अपने अङ्गोंका क्षयरूप व्यय नहीं हो सकता, न राजाके समान कोशक्षयरूप व्यय ही सम्भव है और न निर्गुण तथा सर्वात्मक होनेके कारण उसका गुणक्षयद्वारा ही व्यय हो सकता है।
यदेवंलक्षणं भूतयोनिं भूतानां कारणं पृथिवीव स्थावरजङ्ग-मानां परिपश्यन्ति सर्वत आत्म-भूतं सर्वस्याक्षरं पश्यन्ति धीराः<br>पृथिवी जैसे स्थावर-जङ्गम जगत्‌का कारण है उसी प्रकार जिस ऐसे लक्षणोंवाले भूतयोनि—भूतोंके कारण सबके आत्मभूत अक्षरब्रह्मको धीर—बुद्धिमान्—