मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १९ |
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| यथा च पृथिव्यामोषधयो व्रीह्यादिस्थावरान्ता इत्यर्थः। स्वात्माव्यतिरिक्ता एव प्रभवन्ति। यथा च सतो विद्यमानाज्जीवनः पुरुषात्केशलोमानि केशाश्च लोमानि च सम्भवन्ति विलक्षणानि। | अभिन्न कर देती है, तथा जैसे पृथिवीमें व्रीहि-यव इत्यादिसे लेकर वृक्षपर्यन्त समस्त ओषधियाँ उससे अभिन्न ही उत्पन्न होती हैं और जैसे सत्—विद्यमान अर्थात् जीवित पुरुषसे उससे विलक्षण केश और लोम उत्पन्न होते हैं। |
| यथैते दृष्टान्तास्तथा विलक्षणं सलक्षणं च निमित्तान्तरानपेक्षाद्यथोक्तलक्षणादक्षरात्सम्भवति समुत्पद्यत इह संसारमण्डले विश्वं समस्तं जगत्। अनेकदृष्टान्तोपादानं तु सुखार्थप्रबोधनार्थम् ॥ ७ ॥ | जैसे कि ये दृष्टान्त हैं उसी प्रकार इस संसारमण्डलमें इससे विभिन्न और समान लक्षणोंवाला यह विश्व—समस्त जगत्, किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करनेवाले उस उपर्युक्तलक्षणविशिष्ट अक्षरसे ही उत्पन्न होता है। ये अनेक दृष्टान्त केवल विषयको सरलतासे समझानेके लिये ही लिये गये हैं ॥ ७ ॥ |
सृष्टिक्रम
| यद्ब्रह्मण उत्पद्यमानं विश्वं तदनेन क्रमेणोत्पद्यते न युगपद्बदरमुष्टिप्रक्षेपवदिति क्रमनियमविवक्षार्थोऽयं मन्त्र आरभ्यते— | ब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाला जो जगत् है वह इस क्रमसे उत्पन्न होता है, बेरोंकी मुट्ठी फेंक देनेके समान एक साथ उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार उस क्रमके नियमको बतलानेकी इच्छावाला यह मन्त्र आरम्भ किया जाता है— |
तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।
अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥