मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
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३२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक १
| एह्येहीत्याह्वयन्त्यः सुवर्चसो दीप्तिमत्यः किं च प्रियाम् इष्टां वाचं स्तुत्यादिलक्षणामभिवदन्त्य उच्चारयन्त्योऽर्चयन्त्यः पूजयन्त्यश्चैष वो युष्माकं पुण्यः सुकृतः पन्था ब्रह्मलोकः फलरूपः। एवं प्रियां वाचमभिवदन्त्यो वहन्तीत्यर्थः । ब्रह्मलोकः स्वर्गः प्रकरणात् ॥ ६ ॥ | वे दीप्तिमती आहुतियाँ 'आओ, आओ' इस प्रकार पुकारती तथा प्रिय यानी स्तुति आदिरूप इष्ट वाणी बोलकर उसका अर्चन—पूजन करती हुई अर्थात् 'यह तुम्हारे सुकृतका फल-स्वरूप पवित्र ब्रह्मलोक है' इस प्रकार प्रिय वाणी कहती हुई उसे ले जाती हैं । यहाँ स्वर्गहीको ब्रह्मलोक कहा है, क्योंकि प्रकरणसे यही ठीक मालूम होता है ॥६॥ |
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ज्ञानरहित कर्मकी निन्दा
| एतच्च ज्ञानरहितं कर्मैतावत्फलमविद्याकामकर्मकार्यमतोऽसारं दुःखमूलमिति निन्द्यते— | इस प्रकार यह ज्ञानरहित कर्म इतने ही फलवाला है । यह अविद्या काम और कर्मका कार्य है; इसलिये असार और दुःखकी जड़ है, सो इसकी निन्दा की जाती है— |
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प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा
अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म ।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा
जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥
जिनमें [ ज्ञानबाह्य होनेसे ] अवर—निकृष्टकर्म आश्रित कहा गया है वे [ सोलह ऋत्विक् तथा यजमान और यजमानपत्नी ] ये अठारह यज्ञरूप ( यज्ञके साधन ) अस्थिर एवं नाशवान् बतलाये गये हैं। जो मूढ 'यही श्रेय है' इस प्रकार इनका अभिनन्दन करते हैं, वे फिर भी जरा-मरणको प्राप्त होते रहते हैं ॥ ७ ॥