भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९


कीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः" (मनु० १२।५०) इति ॥११॥होना ]—यह विद्वानोंने उत्तम सात्त्विकी गति बतलायी है"॥११॥

ऐहिक और पारलौकिक भोगोंकी असारता देखनेवाले पुरुषके लिये संन्यास और गुरूपसदनका विधान

अथेदानीमसात्साध्यसाधनरूपात्सर्वस्मात्संसाराद्विरक्तस्य परस्यां विद्यायामधिकारप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—तत्पश्चात् अब इस साध्य-साधनरूप सम्पूर्ण संसारसे विरक्त हुए पुरुषका परा विद्यामें अधिकार दिखानेके लिये यह कहा जाता है—

परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो

निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्

समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२॥

कर्मद्वारा प्राप्त हुए लोकोंकी परीक्षा कर ब्राह्मण निर्वेदको प्राप्त हो जाय, [क्योंकि संसारमें] अकृत (नित्य पदार्थ) नहीं है, और कृतसे [हमें प्रयोजन क्या है ?] अतः उस नित्य वस्तुका साक्षात् ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो हाथमें समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही पास जाना चाहिये ॥ १२ ॥

परीक्ष्य यदेतदृग्वेदाद्यपरविद्याविषयं स्वाभाविक्याविद्याकामकर्मदोषवत्पुरुषानुष्ठेयम् अविद्यादिदोषवन्तमेव पुरुषं प्रति विहितत्वात्तदनुष्ठानकार्यभूताश्चयह जो ऋग्वेदादि अपरविद्याविषयक, तथा अविद्यादि दोषयुक्त पुरुषके लिये ही विहित होनेके कारण स्वभावसे ही अविद्या काम और कर्मरूप दोषसे युक्त पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान किये जानेयोग्य कर्म है तथा उसके अनुष्ठानके कार्यभूत