भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

द्वितीय मुण्डक

प्रथम खण्ड


वक्ष्यमाणग्रन्थस्य प्रयोजनम्
अपरविद्यायाः सर्वं कार्यम्<br>उक्तम् । स च<br>संसारो यत्सारो<br>यस्मान्मूलादक्षरात्<br>सम्भवति यस्मिंश्च प्रलीयते तद-<br>क्षरं पुरुषाख्यं सत्यम्। यस्मिन्<br>विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति<br>तत्परस्या ब्रह्मविद्याया विषयः<br>स वक्तव्य इत्युत्तरो ग्रन्थ<br>आरभ्यते—यहाँतक अपरा विद्याका सारा कार्य कहा । यही संसार है; उसका जो सार है, जिस अपने मूलभूत अक्षरसे वह उत्पन्न होता है और जिसमें उसका लय होता है वह पुरुषसंज्ञक अक्षरब्रह्म ही सत्य है, जिसका ज्ञान होनेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है, वह परा विद्याका विषय है। उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

अग्निसे स्फुलिङ्गोंके समान ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति

तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥

वह यह (अक्षरब्रह्म) सत्य है। जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्निसे उसीके समान रूपवाले हजारों स्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) निकलते हैं, हे सोम्य ! उसी प्रकार उस अक्षरसे अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं ॥ १ ॥