| ६० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २ |
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| गङ्गाद्याः सिन्धवो नद्यः सर्व-रूपा बहुरूपा अस्मादेव पुरुषात् ; सर्वा ओषधयो व्रीहियवाद्याः । रसश्च मधुरादिः षड्विधो येन रसेन भूतैः पञ्चभिः स्थूलैः परिवेष्टितस्तिष्ठते तिष्ठति ह्यन्तरात्मा लिङ्गं सूक्ष्मं शरीरम् । तद्ध्यन्तराले शरीरस्यात्मनश्चात्मवद्वर्तत इत्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥ | आदि अनेक रूपोंवाली नदियाँ भी इसीसे प्रवाहित होती हैं । इसी पुरुषसे व्रीहि, यव आदि सम्पूर्ण ओषधियाँ तथा मधुरादि छः प्रकारका रस उत्पन्न हुआ है, जिस रससे कि पाँच स्थूल भूतोंद्वारा परिवेष्टित हुआ अन्तरात्मा—लिङ्गदेह यानी सूक्ष्म शरीर स्थित रहता है । यह शरीर और आत्माके मध्यमें आत्माके समान स्थित है; इसलिये अन्तरात्मा कहलाता है ॥ ९ ॥ |
ब्रह्म और जगत्का अभेद तथा ब्रह्मज्ञानसे अविद्या-ग्रन्थिका नाश
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| एवं पुरुषात्सर्वमिदं सम्प्रसूतम् । अतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं पुरुष इत्येव सत्यम् । अतः— | इस प्रकार यह सब पुरुषसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः विकार वाणीका आरम्भ और नाममात्रके लिये तथा मिथ्या ही है, केवल पुरुष ही सत्य है। इसलिये— |
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद
निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥
यह सारा जगत्, कर्म और तप (ज्ञान) पुरुष ही है। वह पर और अमृतरूप ब्रह्म है। उसे जो सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानता है, हे सोम्य ! वह इस लोकमें अविद्याकी ग्रन्थिका छेदन कर देता है ॥ १० ॥
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| पुरुष एवेदं विश्वं सर्वम् । न विश्वं नाम पुरुषादन्यत्किञ्चिदस्ति । अतो यदुक्तं तदेवेदम् | पुरुष ही यह विश्व—सारा जगत् है; पुरुषसे भिन्न 'विश्व' कोई वस्तु नहीं है । अतः 'हे भगवन् ! |