मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८१ |
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| स्तादूर्ध्वं च सर्वतोऽन्यदिव कार्या- | नीचे-ऊपर सभी ओर कार्यरूपसे |
| कारेण प्रसृतं प्रगतं नामरूपवद् | नामरूपविशिष्ट होकर फैला हुआ |
| अवभासमानम् । किं बहुना ब्रह्मैव | वह ब्रह्म ही अन्य पदार्थोंके समान |
| इदं विश्वं समस्तमिदं जगद्वरिष्ठं | भास रहा है । अधिक क्या ? यह |
| वरतमम् । अब्रह्मप्रत्ययः सर्वो- | विश्व अर्थात् सारा जगत् श्रेष्ठतम |
| ऽविद्यामात्रो रज्ज्वामिव सर्प- | ब्रह्म ही है । यह सम्पूर्ण अब्रह्मरूप |
| प्रत्ययः । ब्रह्मैवैकं परमार्थसत्यम् | प्रतीति रज्जुमें सर्पप्रतीतिके समान |
| इति वेदानुशासनम् ॥ ११ ॥ | अविद्यामात्र ही है । एकमात्र ब्रह्म |
| ही परमार्थ सत्य है—यह वेदका | |
| उपदेश है ॥ ११ ॥ |
इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
समाप्तमिदं द्वितीयं मुण्डकम् ।
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