भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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८४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३ ]


वृक्षं परिषस्वजाते परिष्वक्त-वृक्षपर आलिङ्गन किये हुए हैं,
वन्तौ सुपर्णाविवैकं वृक्षं फलोप-अर्थात् फलोपभोगके लिये पक्षियोंके
भोगार्थम् ।समान एक ही वृक्षपर निवास करते हैं ।
अयं हि वृक्ष ऊर्ध्वमूलोऽवा-अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ
क्शाखोऽश्वत्थोऽव्यक्तमूलप्रभवःसम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलका आश्रय-
क्षेत्रसंज्ञकः सर्वप्राणिकर्मफला-भूत यह क्षेत्रसंज्ञक अश्वत्थवृक्ष
श्रयस्तं परिष्वक्तौ सुपर्णाविवा-ऊपरको मूल और नीचेकी ओर
विद्याकामकर्मवासनाश्रयलिङ्गो-शाखाओंवाला है । उस वृक्षपर
पाध्यात्मेश्वरौ । तयोः परिष्वक्त-अविद्या, काम, कर्म और वासनाके
योरन्य एकः क्षेत्रज्ञो लिङ्गो-आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप उपाधिवाले
पाधिवृक्षमाश्रितः पिप्पलं कर्म-जीव और ईश्वर दो पक्षियोंके समान
निष्पन्नं सुखदुःखलक्षणं फलंआलिङ्गन किये निवास करते हैं ।
स्वाद्वनेकविचित्रवेदनास्वादरूपंइस प्रकार आलिङ्गन करके रहने-
स्वाद्वत्ति भक्षयत्युपभुङ्क्तेऽविवे-वाले उन दोनोंमेंसे एक—
कतः । अनश्नन्नन्य इतर ईश्वरोलिङ्गोपाधिरूप वृक्षको आश्रित
नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सर्वज्ञःकरनेवाला क्षेत्रज्ञ पिप्पल यानी
सर्वसत्त्वोपाधीरीश्वरो नाश्नाति ।अपने कर्मसे प्राप्त होनेवाला सुख-
प्रेरयिता ह्यसावुभयोर्भोज्य-दुःखरूप फल, जो अनेक प्रकारसे विचित्र अनुभवरूप स्वादके कारण स्वादु है, खाता—भक्षण करता यानी अविवेकवश भोगता है । किन्तु अन्य—दूसरा, जो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप सर्वज्ञ मायोपाधिक ईश्वर है, उसे ग्रहण न करता हुआ नहीं भोगता । यह तो साक्षित्वरूप सत्तामात्रसे भोक्ता और