भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९


आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा-

नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥

यह, जो सम्पूर्ण भूतोंके रूपमें भासमान हो रहा है प्राण है। इसे जानकर विद्वान् अतिवादी नहीं होता। यह आत्मामें क्रीडा करनेवाला और आत्मामें ही रमण करनेवाला क्रियावान् पुरुष ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठतम है ॥ ४ ॥

योऽयं प्राणस्य प्राणः पर ईश्वरो ह्येष प्रकृतः सर्वैर्भूतैर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तैः, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया, सर्वभूतस्थः सर्वात्मा सन्नित्यर्थः, विभाति विविधं दीप्यते । एवं सर्वभूतस्थं यः साक्षादात्मभावेनायमहमस्मीति विजानन्विद्वान्नवाक्यार्थज्ञानमात्रेण स भवते भवति न भवतीत्येतत् किमतिवाद्यतीत्य सर्वानन्यान वदितुं शीलमस्येत्यतिवादी ।यह जो प्राणका प्राण परमेश्वर है वह प्रकृत [परमात्मा] ही सम्पूर्ण भूतों—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियोंके द्वारा अर्थात् सर्वभूतस्थ सर्वात्मा होकर विभासित यानी विविध प्रकारसे देदीप्यमान हो रहा है। 'सर्वभूतैः' इस पदमें इत्थंभूतलक्षणा तृतीया* है। इस प्रकार जो विद्वान् उस सर्वभूतस्थ प्राणको 'मैं यही हूँ' ऐसा साक्षात् आत्मस्वरूपसे जाननेवाला है वह उस वाक्यके अर्थज्ञानमात्रसे भी नहीं होता। क्या नहीं होता ? [इसपर कहते हैं—] अतिवादी नहीं होता। जिसका स्वभाव और सबको अतिक्रमण करके बोलनेका होता है उसे अतिवादी कहते हैं।

* इत्थंभूतलक्षणे (२।३।२१) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ तृतीया विभक्ति हुई है। किसी प्रकारकी विशेषताको प्राप्त हुई वस्तुको जो लक्षित कराता है