नाड़ी परीक्षा एवं नाड़ी विज्ञान (महर्षि कणाद एवं रावण - वैद्यप्रभा हिन्दी व्याख्या सहित)
Nadi Pariksha and Nadi Vijnana with Hindi Commentary
महर्षि कणाद एवं रावण द्वारा
हिंदीटीकासहिता १७ दक्षिणावर्तमें गमन करती है और तीसरी नाड़ी मध्यमें गमन करती है. इन तीनोंके द्वारा तुल्य गमन और आगमनवाला वायुमार्ग जानना ॥७९॥ इडा च शंखचंद्राभा तस्या वामे व्यवस्थिता । पिंगला सितरक्ताभा दक्षिणं पार्श्वमाश्रिता ॥८०॥ शंख और चंद्रमाके समान प्रकाशवाली इडा नाड़ी सुषुम्नाके वाम भागमें व्यवस्थित है, सफेद और लाल कांतिवाली पिंगला नाड़ी सुषुम्नाके दक्षिण भागमें व्यवस्थित है ॥८०॥ चन्द्रः सूर्यो मरुच्चैव त्रयस्तिसृष्ववस्थिताः । तथा रजस्तमः सत्त्वं राज्यहःकाल एव च ॥८१॥ चंद्रमा, सूर्य, वायु ये तीन इन तीनों नाड़ियोंमें व्यवस्थित हैं. रजोगुण, तमोगुण सत्त्वगुण, रात्रि, दिन काल ये भी युक्त जानने ॥८१॥ इडा दोषमयी प्रोक्ता पिंगला वह्निरूपिणी । वाय्वाग्नेयीसुषुम्ना च ब्रह्मद्वारपंथानुगा ॥८२॥ इडा नाड़ी दोषोंवाली. है, पिंगला नाड़ी अग्निरूपवाली है, सुषुम्ना नाड़ी वायु और अग्निरूपवाली है और ब्रह्मद्वारके मार्गमें गमन करती है ॥८२॥ पद्मकोषप्रतीकाशं सुषिरैश्च विभूषितम् । हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं हि तत् ॥८३॥ पद्म कोशके समान और छिद्रोंसे विभूषित हृदय जानना यह विश्वका स्थान है ॥८३॥ दक्षिणा पिंगला नाडी वह्निमंगलगोचरा । देवयानमिति ज्ञेया पुण्यकर्मानुसारिणी ॥८४॥ शरीरके दक्षिण भागमें पुण्यकर्मानुसारिणी और अग्निमंडलमें प्राप्त और मूलाधारसे दक्षिणावधि सहस्रदलपर्यन्त जो पिंगला नाड़ी है तहां देवयान नाम नाड़ी जानना ॥८४॥ इडा च वामनिःश्वासः सोममण्डलगोचरा । पितृयानमिति ज्ञेया वाममाश्रित्य तिष्ठति ॥८५॥
१८ नाड़ीपरीक्षा
वाम नासापुटके द्वारा चंद्रमण्डलमें प्राप्त और मूलाधारावधि सहस्रदलपर्यन्त जो इडा नाड़ी है तिसको पितृयान कहत हैं ॥८५॥ गुदस्य पृष्ठ भागेऽस्मिन्वीणादण्डस्य देहभृत् । दीर्घास्थिमूध्नि पर्यन्तं ब्रह्मदण्डेति कथ्यते ॥८६॥ इसी शरीरमें मूलाधारके पृष्ठभागमें वीणादंडके समान स्थित मस्तकपर्यन्त ब्रह्मदंडा नाड़ी कही जाती है ॥८६॥ तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं ब्रह्मनाडीति सूरिभिः । इडापिंगलयोर्मध्ये सुषुम्ना सूक्ष्मरूपिणी । सर्वं प्रतिष्ठितं यस्मिन्सवंगं सर्वतोमुखम् ॥८७॥ तिस ब्रह्मदंडा नाड़ीके अंतमें एक महीन छिद्र है तिसको पंडित ब्रह्मनाड़ी कहते हैं इडा और पिंगलाके मध्यमें सूक्ष्म रूपवाली सुषुम्ना नाड़ी है जिसमें सर्वरूप और सर्वव्यापी और सब तरफको मुखवाला ब्रह्म प्रतिष्ठित है ॥८७॥ तस्या मध्यगताः सूर्यसोमाग्निपरमेश्वराः । भूतलोका दिशः क्षेत्रं समुद्राः पर्वताः शिलाः ॥८८॥ सुषुम्ना नाड़ीके मध्यमें सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, परमेश्वर ये चार देव, पंचभूत, चौदह लोक, दशोदिशा, काशी आदि धर्मक्षेत्र, सात समुद्र, सात पर्वत ॥८८॥ द्वीपाश्च निम्नगा वेदाः शास्त्रविद्याकुलाक्षराः । स्वरमंत्रपुराणानि गुणाश्चैतानि सर्वशः ॥८९॥ सब द्वीप, नदी, सब वेद, मीमांसा आदि शास्त्रविद्या, ककार आदि अक्षर, अकार आदि स्वर, गायत्री आदि मंत्र, अठारह पुराण, तीनों गुण ॥८९॥ बीजजीवात्मकस्तेषां क्षेत्रज्ञः प्राणवायवः । सुषुम्नांतर्गतं विश्वं तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥९०॥ महादादि जीवात्मक जीव, प्राण आदि पंच, नाग आदि पंच वायु ये सब स्थित हैं और सुषुम्ना नाड़ीके अंतर्गत ही संपूर्ण जगत है ९०॥
हिंदीटीकासहिता १९ क्वचिच्चक्रं च कोशश्च क्वचिज्जीवगृहं स्थितम् । अस्मिंश्चक्रेस्थितोजीवःपुण्यापुण्यप्रदेशिताम् ॥९१॥ कहीं चक्र है, कहीं कोषके आकार है, कहीं जीवका घर है ऐसे जीवका पुण्य और पाप इस चक्ररूपमें स्थित जानना ॥९१॥ प्राणांश्च सममारूढो देहे भ्रमति सर्वदा । तंतुपंजरमध्यस्था यथा भ्रमति लूतिका ॥९२॥ वह जीव सब प्राणोंका आरोहण कर देहविषे सब काल भ्रमता है, जैसे सूतपिंजरके मध्यमें मकड़ी भ्रमती है ॥९२॥ यस्तमभ्यारुते नित्यं तच्च तेनान्तरात्मना । न तस्य जायते मृत्युरिति सर्वागमोदितम् ॥९३॥ जो मनुष्य जीवगत मनके द्वारा तिस नित्य ब्रह्मका अभ्यास करता है तिसकी मृत्यु नहीं होती ऐसे सब शास्त्रमें प्रकाशित है ॥९३॥ नाभिरोजो गुदं शुक्रं शोणितं शंखकौ तथा । मूर्द्धा स कांडहृदयं प्राणस्यायतनं दश ॥९४॥ नाभि, ओज, गुदा, वीर्य, रक्त, दोनों कनपटी, मस्तक, कण्ठ और हृदय ये दश प्राणके स्थान हैं ॥९४॥ त्रिंशद्धस्तप्रमाणा तु विश्वोदरी द्वयाधिका । एकहस्तप्रमाणा स्यात्कण्ठदेशस्यनाडिका ॥९५॥ बत्तीस हाथ प्रमाणवाली विश्वोदरी नाड़ी सर्व मनुष्योंके पेटमें स्थित है. एक हाथ प्रमाणवाली नाड़ी कंठदेशमें स्थित है ॥९५॥ दशहस्ता ततः पश्चादामाशये प्रकीर्तिता । पच्यमानाशया ज्ञेया दशहस्ता ततः परम् ॥९६॥ तिसके पीछे दश हाथ प्रमाणवाली नाड़ी आमाशयमें है तिससे परे दश हाथ प्रमाणवाली नाड़ी पच्यमान आशयमें स्थित है ॥९६॥ पक्वाशयात्ततः पक्वादशहस्ता प्रकीर्तिता । एकहस्ता गुह्यदेशे शंखावर्त्ता त्रिनाडिका ॥९७॥ तिससे पर दश हाथ प्रमाणवाली नाड़ी पक्वाशयमें स्थित है,
२० नाड़ीपरीक्षा एक हाथ प्रमाणवाली और शंखकी आंटीके सदृश नाड़ी गुदामें स्थित है ॥९७॥ भुक्तमामाशये तिष्ठेत्पच्यमानाशये पचेत् । पक्वं पक्वाशये तिष्ठेद्वह्निः पक्वाशयोपरि ॥९८॥ भोजन किया आमाशयमें स्थित रहता है और पच्यमाना शयमें जाके पकता है और पककर पक्वाशयमें ठहरता है. पक्वाशयके ऊपर अग्नि है ॥९८॥ पच्यमानाशये पक्वं मलपक्वाशये व्रजेत् । रसो भुक्तादिकानां च नाभिनाड्याकलेवरम् । सकलं याति मरुता नीयमानः स्वमाश्रयम् ॥९९॥ पच्यामानाशयमें पके हुए मलको पक्वाशयमें प्राप्त करता है आहार आदि रस नाभिकी नाड़ीके द्वारा वायुसे प्राप्त होके संपूर्ण शरीरमें गमन करते हैं ॥९९॥ नाभिस्तु कूर्मरूपःस्यान्महानाड्यष्टपाद्द्भवेत् ॥ चतस्रः पृष्ठदेशे स्युश्चतस्रः क्रोडदेशतः ॥१००॥ कछुएके आकार नाभि है तहां आठ पैरवाली महानाड़ी है पृष्ठभागमें चार नाड़ी और छाती देशमें चार नाड़ी स्थित हैं ॥१००॥ इति हिंदीटीका सहित नाड़ीपरीक्षा संपूर्ण ।