नाड़ी परीक्षा एवं नाड़ी विज्ञान (महर्षि कणाद एवं रावण - वैद्यप्रभा हिन्दी व्याख्या सहित)
Nadi Pariksha and Nadi Vijnana with Hindi Commentary
महर्षि कणाद एवं रावण द्वारा
२० नाड़ीपरीक्षा एक हाथ प्रमाणवाली और शंखकी आंटीके सदृश नाड़ी गुदामें स्थित है ॥९७॥ भुक्तमामाशये तिष्ठेत्पच्यमानाशये पचेत् । पक्वं पक्वाशये तिष्ठेद्वह्निः पक्वाशयोपरि ॥९८॥ भोजन किया आमाशयमें स्थित रहता है और पच्यमाना शयमें जाके पकता है और पककर पक्वाशयमें ठहरता है. पक्वाशयके ऊपर अग्नि है ॥९८॥ पच्यमानाशये पक्वं मलपक्वाशये व्रजेत् । रसो भुक्तादिकानां च नाभिनाड्याकलेवरम् । सकलं याति मरुता नीयमानः स्वमाश्रयम् ॥९९॥ पच्यामानाशयमें पके हुए मलको पक्वाशयमें प्राप्त करता है आहार आदि रस नाभिकी नाड़ीके द्वारा वायुसे प्राप्त होके संपूर्ण शरीरमें गमन करते हैं ॥९९॥ नाभिस्तु कूर्मरूपःस्यान्महानाड्यष्टपाद्द्भवेत् ॥ चतस्रः पृष्ठदेशे स्युश्चतस्रः क्रोडदेशतः ॥१००॥ कछुएके आकार नाभि है तहां आठ पैरवाली महानाड़ी है पृष्ठभागमें चार नाड़ी और छाती देशमें चार नाड़ी स्थित हैं ॥१००॥ इति हिंदीटीका सहित नाड़ीपरीक्षा संपूर्ण ।