भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( २१७ ) का शङ्खचूड़ ने क्या ही अच्छा प्रत्युपकार किया है ? तो क्या मैं अभी अपने आप को मार डालूँ ? अथवा, इन दोनों को धैर्य बन्धाता हूँ । पिता जी, धीरज करो; माता जी, धीरज करो । [दोनों होश में आते हैं] वृद्धा - बेटी, उठ; रो मत । हम क्या जीमूतवाहन के बिना जी सकते हैं ? अतः धीरज कर । मलयवती - (होश में आकर) आर्यपुत्र ! मैं आप को कहां ढूँढूँ । जीमूतकेतु - हाय पुत्र, गुरुजनों के चरणों की सेवा करने की विधि जानने वाले ;- मेरे पैरों पर चूडामणि गिराते हुए, परलोक गए हुए भी तू ने विनय का क्रम (मार्ग) नहीं छोड़ा । (चूड़ामणि लेकर) हाय पुत्र ! क्या अब तुम्हारे दर्शन इतने ही रह गए ? (हृदय पर रख कर) आह !-

  1. कटाक्ष अथवा उपालम्भ रूप में । उसके इतने बड़े उपकार के बदले मैं ने इतना उपकार किया ।
  2. क्रम = मर्यादा ; मार्ग ; तरीका ।