भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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कथा-सरित्सागर और बाल-रामायण आदि में मिलता है। पुतलियों को रंगमञ्च पर यथा-स्थान रखने या सजाने वाला स्थापक कहलाता था और जो व्यक्ति कठपुतलियों के तागे हाथ में पकड़ कर उन को नचाता था वह 'सूत्रधार' कहलाता था। कहते हैं संस्कृत नाटक में 'स्थापक' और 'सूत्रधार' शब्द इन्हीं पुतलियों के खेल से लिए गए हैं। (और धीरे धीरे नाटक से स्थापक का लोप हो गया; उस का काम भी सूत्रधार ही करने लग गया।) परन्तु प्रो० हिलीब्रां का विचार है कि कठपुतलियों के नाच से कहीं पहले नाटक का आरम्भ हुआ होगा, क्योंकि नाटक तो स्वयं कठपुतलियों के नाच का आधार है। प्रो० ल्यूडर्ज़ ने कहा है कि छाया नाटकों में नाटक के बीज मिलते हैं। यह छाया नाटक ही सम्भवतः आजकल के सिनेमा के मानों मूल आधार थे। चमड़े की कठपुतलियां बना कर प्रकाश के आगे नचाते थे। उनकी छाया आगे टंगे हुए पर्दे पर पड़ती थी। परन्तु, उल्टे इन का भी आधार नाटक ही हो सकता है। तो आख़िर नाटक आया कहां से ? इसके बीज हम किधर ढूंढें ? इस का उत्तर यही है कि वेद तथा वैदिक यज्ञ, रामायण तथा महाभारत, कठपुतलियों के नाच अथवा छाया नाटक, धार्मिक उत्सव तथा लौकिक क्रियाओं सब में नाटक के अंश वर्तमान हैं। कोई एक मत इसके भिन्न भिन्न उपकरणों की गुत्थी को सुलझा नहीं सकता। नाटक को अपने असली रूप में आने में कई शताब्दियां लगीं। जो भी नई चीज़ इसके आगे आई उसे इसने अपने अन्दर समा लिया—परन्तु अपनी वैयक्तिक विशेषताओं को नहीं छोड़ा। विण्डिश आदि कई महानुभावों का विचार है कि भारतीय नाट्यकला पर यूनानी प्रभाव पर्याप्त रूप में पड़ा है। वे कहते हैं यूनानी नाटक से ही संस्कृत नाटक का जन्म हुआ है। संस्कृत नाटक के 'यवनिका'