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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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सरलता ये दो भक्तिके साधनमें परम सहायकरूप हैं और अभिमान एवं दम्भ महान् बाधक। ये दोनों आसुरी सम्पदाके दुर्गुण हैं। इनके साथ 'आदि' शब्द जोड़कर सूत्रकारने आसुरी सम्पदाके* अन्यान्य दुर्गुणोंकी तरफ इशारा किया है। अतएव सभी आसुरी दुर्गुणोंका त्याग करना चाहिये।

  • श्रीमद्भगवद्गीताके १६ वें अध्यायमें श्लोक ७ से २० तक श्रीभगवान्ने आसुरी सम्पत्तिका जो वर्णन किया है उसका भावार्थ इस प्रकार है— आसुरी मनुष्य धर्माधर्मविषयक प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते, इसलिये उनमें न पवित्रता है, न आचार है और न सत्य ही रहता है। वे आसुरी मनुष्य कहते हैं कि यह जगत् असत्य, अप्रतिष्ठ (धर्माधर्मव्यवस्थासे रहित), ईश्वररहित और अन्योन्यसम्भूत है अर्थात् स्त्री-पुरुष-मिथुनजनित है। इस जगत्का और कोई कारण नहीं, यह केवल स्त्री-पुरुषके कामजनित संयोगसे ही उत्पन्न है। वे सब अल्पबुद्धि मनुष्य इस प्रकारकी दृष्टिका आश्रय करके मलिनचित्त, उग्रकर्मा और अहितकारी होकर जगत्के विनाशके लिये ही जन्म ग्रहण करते हैं। वे दुष्पूरणीय (किसी प्रकारसे भी पूरी न हो ऐसी) कामनाओंका आश्रय करके दम्भ, अभिमान और मदके वशीभूत हो मोहवश असदाग्रह (इस षड्यन्त्रसे अमुक मनोरथ पूर्ण हो जायगा ऐसी वेदशास्त्रविरुद्ध दुराशा) स्वीकार कर अपवित्र व्रत (मद्यमांसादि तथा चोरी, झूठ, कपटादिद्वारा सम्पादित नरकादि-उत्पादक कुव्रतोंको) धारणकर शास्त्रविरुद्ध कर्मों—पापकर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं। अन्तिम श्वासतक अपार विषयचिन्ताओंसे घिरे हुए वे 'कामोपभोग' ही परम पुरुषार्थ है, इस प्रकार स्थिर निश्चय करके सैकड़ों प्रकारकी आशाओंकी फाँसियोंसे बँधे हुए कामक्रोधपरायण होकर कामभोगके लिये अन्यायपूर्वक (चोरी, विश्वासघात आदिके द्वारा) धन संचय करनेकी चेष्टा करते हैं। आज मैंने यह पाया, यह मनोरथ भी पूरा होगा; यह धन मेरा है, फिर वह धन भी प्राप्त होगा। मैंने अमुक शत्रुको मार डाला; अब उन शत्रुओंको भी मारूँगा। मैं ईश्वर (के समान सर्वशक्तिमान्)- हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं धनी हूँ, मैं बड़े कुलवाला हूँ, मेरे समान और कौन है, मैं यज्ञ करूँगा, मैं (नाम, यश या स्वार्थके लिये) दान करूँगा, मैं मौज करूँगा—इस प्रकार अज्ञानसे मोहित होकर वे अनेकों विषयोंके चिन्तनमें लगे हुए विभ्रान्त चित्तवाले, मोहजालसे ढके हुए कामभोगमें आसक्त होकर महान् क्लेशदायक अपवित्र नरकोंमें पड़ते हैं। वे अभिमानी स्वयं अपनेको श्रेष्ठ समझते हैं (अपनेमें पूज्यबुद्धि रखते हैं), अकड़े रहते हैं, धन, मान और मदके नशेमें चूर हुए वे केवल दम्भपूर्वक लोगोंको धर्मात्मापनका स्वाँग दिखानेके लिये (ईश्वरप्रीत्यर्थ श्रद्धा- विश्वासपूर्वक नहीं) अविधिपूर्वक नाममात्रका यज्ञ करते हैं। अहंकार, बल, घमण्ड,