प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिके साधन और अन्तराय १२१ सहनेको उनमेंसे एक भी तैयार नहीं था, क्योंकि उसे अलग करते ही प्राण अलग हो जाते हैं; परन्तु ऊपरसे बात गाँठकर उन्होंने कहा—'कृष्ण! तुम खुद ही गड़बड़ मचाते हो और फिर तनकर रूठ जाते हो; हटो यहाँसे, हम तुम्हें अपने साथ नहीं खेलने देंगे।' बस, जहाँ फटकार मिली कि प्राणधन श्यामसुन्दर ढीले पड़ गये। लगे पैरों पड़ने और शपथ खा- खाकर क्षमा माँगने। सूरदासजीने गाया है— खेलनमें को काको गुस्सैयाँ। हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस ही कत करत रुसैयाँ॥ जाति पाँति हमते बड़ नाहीं, ना हम बसत तुम्हारी छैयाँ। अति अधिकार जनावत ताते, जाते अधिक तुम्हारे गैयाँ॥ रूठ करे ता सँग को खेलै, हा हा खात परत तब पैयाँ। 'सूरदास' प्रभु खेल्यो ही चाहें, दाँव दियो करि नंद दुहैयाँ॥ यह है उनका क्रोध। अब रही मानकी बात, सो दूषणरहित मान तो इस प्रेमाभक्तिका एक भूषण ही है। एक समय श्रीराधारानी रूठ गयीं, मान कर बैठीं और सखियोंसे बोलीं— सखि नँदलाल न आवन पावैं। भीतर चरन धरन जिन दीजो, चाहे जिते ललचावैं॥ ऐसनको बिस्वास कहा री कपट बैन बतियावैं। 'नरायन' इक मेरे भवन तजि अनत चहे जहँ जावैं॥ भगवान् मनाते-मनाते थक गये और शेषमें बोले— इतो श्रम नाहिंन तबहुँ भयो। सुनु राधिका! जितो श्रम मोकौं ते यह मानु दयो॥ धरनीधर बिधि बेद उधारो, मधु सो सत्रु हयो। द्विज नृप किए दुसह दुख मेटे, बलिको राज लयो॥