भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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भक्तिके साधन और अन्तराय १२३ तीव्र काम उसी वस्तुके लिये उत्पन्न होता है जो सबसे श्रेष्ठ हो, अखिल ऐश्वर्यमय हो, महान् माधुर्यसे पूर्ण हो, सर्वांगसुन्दर हो, आनन्दमय हो; भगवान्में यह सब कुछ है। यह सोचकर सदा-सर्वदा एकमात्र श्रीकृष्णमिलनकी कामनासे पीड़ित रहे और यह कामवासना उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाय। प्रेमभरा क्रोध इस प्रकार करे कि 'तुम बड़े निठुर हो, इतना पुकारनेपर भी नहीं आते; याद रखो अभी तो मैं पुकारता हूँ—पीछे तुम्हें पीछे-पीछे भटकना पड़ेगा।' आठों पहर चिन्तनमें लगे रहकर प्रेमभरा मान इस प्रकार करे कि 'मेरे पास तो अटूट चिन्तन-धन है, मैं तुम्हारी कोई गरज नहीं रखता; तुम्हें सौ बार गरज हो तो आना।' इत्यादि। भगवान्के प्रति काम, क्रोध और अभिमान कैसे किया जा सकता है, इसका एक और सुन्दर उदाहरण मातृपरायण शिशु है। छोटे बच्चेको आप बहुमूल्य रत्न दीजिये, उसे बढ़िया-बढ़िया चीजें खानेको दीजिये, उसका खूब सम्मान कीजिये, उसका यश गाइये, उसे स्वर्ग-मोक्ष मिलनेकी बात कहिये, वह माता और मातृस्तनोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहता। चाहे क्या, वह और किसी वस्तुको जानता ही नहीं, उसके लिये जाननेकी और चाहनेकी एकमात्र वस्तु माँ है। माँके बदलेमें वह किसी वस्तुसे भी सन्तुष्ट नहीं हो सकता। इसी प्रकार भक्तकी कामना केवल भगवान्के लिये ही होनी चाहिये। एकमात्र भगवान् ही उसके काम्य होने चाहिये। बच्चा कुछ बड़ा हुआ; इधर-उधर कुछ चलने लगा, चलते- चलते ठोकर खाकर गिर पड़ा, रोने लगा। बच्चेका रोना सुनकर