प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेमी भक्तोंकी महिमा १३५ यतस्तदीयाः ॥ ७३ ॥ ७३-क्योंकि (भक्त सब ) उनके ( भगवान्के ) ही हैं। भक्त अपनी भक्तिके प्रभावसे भगवद्रूप ही हो जाते हैं, इसीलिये उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती और उनमें कोई अपनेको किसी भी हेतुसे ऊँचा नहीं समझता। □ □ पीठ देकर बैठना, २४-भगवान्की मूर्तिके सामने जूते पहनकर जाना, २५-भगवान्की मूर्तिके सामने माला धारण करना, २६-भगवान्की मूर्तिके सामने छड़ी लेकर जाना, २७-भगवान्की मूर्तिके सामने नीले कपड़े पहनकर जाना, २८-दाँतुन-कुल्ला किये बिना जाना, २९-मलत्याग या मैथुनादिके बाद कपड़े बदले बिना मन्दिरमें प्रवेश करना, ३०-भगवान्की मूर्तिके सामने हाथ-पैर फैलाना, ३१-भगवान्की मूर्तिके सामने पान खाना, ३२-भगवान्की मूर्तिके सामने जोरसे हँसना, ३३-कुचेष्टा करना, ३४-स्त्रियोंके चारों ओर घूमना, ३५-क्रोध करना, ३६-भगवान्की मूर्तिके सामने किसी दूसरेका अभिवादन करना, ३७-दुर्गन्धवाली कोई चीज खाकर दुर्गन्ध दूर हुए पहले मन्दिरमें जाना, ३८-मादक द्रव्य सेवन करना, ३९-किसीको अपमानित करना या मारना, ४०-काम- क्रोधादिकी चेष्टा करना, ४१-अतिथि या साधुकी आवभगत न करना, ४२-अपनेको भक्त, धर्मात्मा, पण्डित या पुण्यवान् समझना, ४३-नास्तिक, व्यभिचारी, हिंसक, लोभी और झूठ बोलनेवाले मनुष्योंका संग करना, ४४-विपत्तिमें ईश्वरपर दोष लगाना, ४५- पापके लिये धर्म करना, ४६-किसीको किंचित् भी कष्ट देकर अपनेको धार्मिक समझना, ४७-स्त्री, पुत्र, परिवार, आश्रित, दीन और साधुका पालन-पोषण न करना, ४८-किसी वस्तुको अपनी भोग्य समझकर भगवान्के निवेदन करना या बिना निवेदन किये भोगना, ४९-अपने इष्टदेवके नामकी शपथ करना, ५०-धर्म और भगवान्के नामको बेचकर धन कमाना, ५१-अपने इष्टदेवको छोड़कर दूसरेसे आशा करना, ५२-शास्त्रोंकी मर्यादाको तोड़ना, ५३-ब्रह्मज्ञान न होनेपर भी ब्रह्मज्ञानीके समान आचरण करना, ५४-सम्प्रदायभेदसे वैष्णवोंमें किसीको ऊँचा-नीचा समझना, ५५-देवताके समान आचरण करना, ५६-अवतारोंकी लीलाओंमें तारतम्य देकर उनकी निन्दा करना, ५७-दिल्लगीमें भी किसीको 'आप ही भगवान् हैं' ऐसा कहना, ५८-भगवान् किसीके मुखापेक्षी हैं, भूलकर भी ऐसा समझना, ५९-लोभवश किसीको भगवत्प्रसाद या चरणोदक देना, ६०-भगवान्के चित्र, प्रतिमा या नामका अपमान करना, ६१- किसी भी जीवको किसी प्रकारसे कष्ट पहुँचाना, भय दिखलाना या किसीका अहित करना, ६२-तर्क-वितर्कमें हार जाने या सिद्धान्त स्थापित न कर सकनेपर आस्तिकताको त्याग देना, ६३-भगवान्के अवतारोंके जन्म-कर्मोंको साधारण समझना, ६४- भगवान्के युगलरूपमें द्वैतबुद्धि करना।