प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ प्रेम-दर्शन ८—दीन प्राणियोंपर दया और यथासाध्य तन-मन-धनसे उनकी सेवा। ९—सब कर्मोंको भगवान्के प्रति अर्पण। १०—सब प्राणियोंमें भगवान्को देखनेका अभ्यास। श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं— श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम्। परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम॥ आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्। मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः॥ मदर्थेष्वंगचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्। मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥ मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च। इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद्व्रतं तपः॥ एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्। मयि संजायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥ (श्रीमद्भागवत ११।१९।२०—२४) ‘मेरी अमृतके समान कल्याणमयी कथामें श्रद्धा, निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन, मेरी पूजामें पूर्ण निष्ठा, स्तोत्रोंके द्वारा मेरी स्तुति, मेरी सेवामें निरन्तर आदर, सब अंगोंसे मुझको नमस्कार, मेरे भक्तोंका विशेषरूपसे पूजन, सब प्राणियोंमें मुझे देखना, मेरे लिये ही सारे लौकिक कर्म करना, बातचीतमें केवल मेरे ही गुणोंकी चर्चा करना, मनको मुझमें ही अर्पण कर देना, समस्त कामनाओंको छोड़ देना, मेरे लिये धन, भोग और सुखोंको त्याग देना और मेरे ही लिये यज्ञ, दान, होम, जप, तप