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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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[ १३ ] प्रवेश है और योगबलसे मन करते ही तुरन्त कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाते हैं। वेद, स्मृति, पुराण, संहिता, ज्योतिष, संगीत आदि सभी शास्त्रोंमें आप दृष्टिगोचर होते हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु, शिव आदिसे लेकर घोर राक्षसतक आपका सम्मान, विश्वास और आदर करते हैं। देवराज इन्द्र भी आपके वचनोंका आदर करते हैं और देवशत्रु हिरण्यकशिपुकी पत्नी कयाधू भी आपकी बातपर विश्वास कर आपके आश्रममें अपनेको सुरक्षित समझती है। कहीं आप व्यास, वाल्मीकि, शुकदेव-सरीखे महापुरुषोंको परमतत्त्वका उपदेश देते दिखायी देते हैं तो कहीं दो पक्षोंमें कलह और विवाद खड़ा कर देनेके प्रयासमें लगे दीखते हैं। वास्तवमें आप अपने लिये कुछ भी नहीं करते। जिस कार्यसे जिसका मंगल देखते हैं और भगवान्‌की लीलाका एक सुन्दर दृश्य सामने ला पाते हैं, उसी कार्यको करने लगते हैं। इनका विवाद और कलह कराना भी लोकहितार्थ और भगवान्‌की लीलाके साधनार्थ ही हुआ करता है। क्योंकि इनकी प्रत्येक चेष्टा भगवान्‌की ही चेष्टा होती है। इनको तो वस्तुतः भगवान्‌का 'मन' ही समझना चाहिये; गम्भीर दृष्टिसे विचार करनेपर भगवत्कृपासे यह बात स्पष्ट दीखती है। कुछ लोग कहते हैं कि नारद नामके कई भिन्न-भिन्न व्यक्ति हुए हैं। उनमें वे सात मुख्य मानते हैं—१-ब्रह्माके मानस पुत्र, २-पर्वत ऋषिके मामा, ३-वसिष्ठपत्नी अरुन्धतीके भाई या सत्यवती नामक स्त्रीके स्वामी, ४-यहाँकी वहाँ करके आपसमें लोगोंको भिड़ा देनेवाले, ५-कुबेरके सभासद्, ६-भगवान् श्रीरामकी सभाके आठ धर्मशास्त्रियोंमेंसे एक और ७-जनमेजयके सर्पयज्ञके एक सदस्य। यहाँपर हमें न तो इस विवादमें पड़ना है कि नारद एक थे या अनेक और न विवाद करके इसका निर्णय करनेकी हममें