प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं करता। उसका चित्तरूपी भ्रमर तो अचंचलरूपसे भगवान्के उन चारु चरणकमलोंमें ही लगा रहता है, जिनको निरन्तर ध्यानपूर्वक खोजनेपर भी देवता नहीं पा सकते। ऐसा वह भक्त कुछ भी नहीं चाहता।' वह बार-बार कातर कण्ठसे यही कहता है कि मुझे न मोक्ष चाहिये, न ज्ञान चाहिये, न वैभव चाहिये, न ऋद्धि-सिद्धि चाहिये और न महान् कीर्ति ही चाहिये। किसी भी योनिमें जाना पड़े, कुछ भी हो, इसकी भी तनिक-सी चिन्ता नहीं। बस, हे मेरे प्रियतम ! तुम्हारे चरणोंमें मेरा प्रेम, बिना किसी हेतुका प्रेम, पगला प्रेम, अन्धा प्रेम, प्रेममय प्रेम, प्रियतममय प्रेम दिनोंदिन बढ़ता ही रहे। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥ श्रीशंकराचार्य जगज्जननीरूप भगवान्से प्रार्थना करते हैं— न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥ अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्र्याणि परिपाल- नीयानि॥ ७८॥ ७८-(भक्तिके साधकको) अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारोंका भलीभाँति पालन करना चाहिये। छिहत्तरवें सूत्रमें भक्तिको बढ़ानेवाले कर्मोंका आचरण करनेकी बात कही गयी है। इस सूत्रमें उन क्रियाओं और सद्गुणोंमेंसे पाँच प्रधान आचारोंका नाम निर्देश करके सूत्रकार इनके पालनकी अत्यन्त आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं।