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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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१५६ प्रेम-दर्शन छोड़ देता है, परन्तु इन दोनोंको नहीं छोड़ता। अवश्य ही लीलामय भगवान्‌की आज्ञा या रुचिके अनुसार सिद्ध भक्तको कहीं-कहीं जीवनपद्धति बदलनी पड़ती है। परन्तु वह नियम नहीं है, अपवाद है। यह निश्चय है कि वह किसी प्रकारकी भी आसक्ति, ममता, कामना, वासना, अहंकार या मोहवश जीवन- पद्धतिको नहीं बदलता। जहाँ किसी कारणवश किसी समय उसकी जीवनपद्धतिमें और उसके स्वाभाविक स्वधर्म भगवत्प्रेममें विरोध आता दीखता है, वहीं भगवान्‌की आज्ञा लेकर वह अपने स्वधर्मकी रक्षाके लिये नीतिको छोड़ देता है। ऐसे ही स्थलोंके लिये—भरत, प्रह्लाद, विभीषण, श्रीगोपीजन आदिके उदाहरण मिलते हैं, जहाँ उन्होंने भगवान्‌के लिये माता, पिता, भाई और पति आदिकी आज्ञाओंका उल्लंघन किया है। परन्तु वहाँ भी देखा जाय तो सदाचार-नीतिका त्याग नहीं हुआ है। प्रेमधर्मके पालनार्थ भक्तोंने प्रायः स्वयं ही कष्ट सहा है। उस अवस्थाकी बात दूसरी है जिसमें सारे विधि-निषेधोंका भगवान्‌के चरणोंमें समर्पण हो जाता है। परन्तु स्मरण रहे, वह समर्पण होता है, किया नहीं जाता। विधि-निषेधोंका बोझ उस बावले भक्तके सिरसे उतार लिया जाता है, वह जानकर नहीं उतारता और उस मस्तीमें भी उसमें कोई दुर्गुण रहता हो सो बात नहीं है। परन्तु यहाँ तो साधककी चर्चा हो रही है और साधकको बड़ी ही सावधानीके साथ शास्त्रविहित सद्गुणों और सदाचारोंका रक्षण और पालन करना चाहिये। सूत्रकारने जिन पाँच गुणोंका नाम लिया है उनका स्वरूप संक्षेपमें यों समझना चाहिये। अहिंसा—शरीर, मन और वाणीसे किसी भी जीवको