भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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१५८ | प्रेम-दर्शन

(ङ) अतिथिसत्कार और भगवन्नामकी ध्वनिसे घरको पवित्र रखना। (च) शास्त्रविहित आचरणोंसे अन्य सभी बाह्य कर्मोंको शुद्ध रखना। भीतरी— दम्भ, वैर, अभिमान, आसक्ति, ईर्ष्या, द्वेष, शोक, पापचिन्तन, व्यर्थ विषयचिन्तन आदि दोषोंको मनमें यथासाध्य न आने देकर सरलता, प्रेम, विनय, वैराग्य, अद्वेष, प्रसन्नता, सच्चिन्तन और भगवच्चिन्तनके द्वारा मनको पवित्र रखना। दया— दुःखी मनुष्य घरका या दूसरा हो, मित्र हो या शत्रु हो, उसको दुःखकी दशामें देखकर बिना किसी भेदभावके मनका व्याकुल हो जाना और यथासाध्य कष्ट सहकर तथा त्याग करके भी उसके दुःखको दूर करनेकी चेष्टा करना। यह भाव सभी जीवोंके प्रति होना चाहिये और सभी कालमें होना चाहिये। जिस क्रियासे जीवोंका अहित होता हो और उन्हें दुःख पहुँचता हो, उन क्रियाओंको त्याग देना चाहिये। इसी प्रकार देश या समाजमें जिन प्रथाओं और कृत्योंसे जीवोंका अहित होता हो, उन्हें बन्द करानेकी चेष्टा करनी चाहिये। आस्तिकता— ईश्वर और शास्त्रोंपर प्रत्यक्षकी तरह पूर्ण विश्वास होना चाहिये। भगवान् हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वेश्वर हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, सर्वज्ञ हैं, परम दयालु हैं, परम सुहृद् हैं, भक्तवत्सल हैं, दीनबन्धु हैं और सदा सर्वत्र विराजमान हैं, इन बातोंपर विश्वास करते ही सारे पाप-ताप अपने-आप ही नष्ट हो जाते हैं। भगवान्‌में विश्वास करनेकी आवश्यकता सबसे पहले और सबसे अधिक है। भगवान्‌के अस्तित्व और उनके प्रभाव