प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ प्रेम-दर्शन तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ (१६।१-३) 'हे भारत! निर्भयता, अन्तःकरणकी शुद्धि, भगवान्के स्वरूपमें निरन्तर दृढ़ स्थिति (आस्तिकता), दान, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोधहीनता, त्याग, शान्ति, किसीकी निन्दा या चुगली न करना, सब प्राणियोंपर दया, लोभरहित होना, कोमलता, ईश्वर और शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें लज्जा, अचंचलता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अद्रोहता और अभिमानशून्यता—ये सब गुण दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए पुरुषमें रहते हैं। यह दैवी सम्पत्ति भक्तमें ही रहती है। इसीलिये भक्तोंको 'देव' कहा गया है। द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। विष्णुभक्तः* स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः॥ (पद्मपुराण) 'इस जगत्में दो प्रकारके जीव हैं। एक दैव और दूसरे आसुर। जो भगवान्के भक्त हैं, वह दैव हैं, जो भक्त नहीं हैं, वही आसुर हैं।' सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैर्भगवानेव भजनीयः ॥ ७९ ॥ ७९-सब समय सर्वभावसे निश्चिन्त होकर (केवल) भगवान्का ही भजन करना चाहिये। यह सूत्र बड़े ही महत्त्वका है। इसमें देवर्षिने प्रेममार्गी भक्तके भगवद्भजनका बड़ा ही सुन्दर प्रकार बतलाया है। वास्तवमें जो *—यहाँ 'विष्णुभक्त' शब्दसे शास्त्रानुसार भगवान्के किन्हीं भी नामरूपका सात्त्विक भक्त समझना चाहिये। भगवान्के नामरूपोंमें भेद मानना तो अपराध ही माना गया है।