प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 178 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १६ ] एकमात्र भक्तिपूर्वक श्रीहरिका गुण वर्णन करना ही बतलाया है। मेरे पूर्वजन्मका इतिहास सुनकर उसका विचार कीजिये कि श्रीहरिके गुणश्रवणसे मैं क्या-से-क्या हो गया। हे महामुनि! मैं पूर्वकालमें एक दासीपुत्र था। एक समय चातुर्मास्य बितानेके लिये वर्षाकालमें हमारे गाँवमें बहुत-से महात्मा पधारे। मैं छोटा बालक था। मेरी माताने मुझे उन महापुरुषोंकी सेवामें लगा दिया। मैं उन महात्माओंके सामने किसी प्रकारका लड़कपन नहीं करता था, सब खेलोंको छोड़कर शान्तिके साथ उनके चरणोंमें बैठा रहता था और बहुत ही कम बोलता था। इन्हीं सब कारणोंसे वे महात्मा समदृष्टि होनेपर भी मुझपर प्रसन्न होकर विशेष कृपा रखने लगे। उन मुनियोंकी आज्ञासे मैं उनके पत्तोंमें बची हुई जूठन खा लेता था। इसीके प्रभावसे मेरे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये। ऐसा करते-करते कुछ समयमें मेरा चित्त शुद्ध हो गया जिससे उनके धर्ममें (भागवतधर्ममें) मेरी रुचि हो गयी। वहाँ वे लोग नित्य श्रीकृष्णकी कथाएँ गाते थे और मैं उन महात्माओंके अनुग्रहसे उन मनोहर कथाओंको श्रद्धाके साथ सुनता था। ऐसा करते-करते श्रीभगवान्में मेरी भक्ति हो गयी। हे महामुनि! पहले भगवान्में मेरी रुचि हुई, फिर मेरी स्थिर दृढ़ मति हो गयी। उस विशुद्ध दृढ़ बुद्धिके प्रभावसे मैं अपने मायारहित शुद्ध परब्रह्मरूपमें समस्त सत्-असत् प्रपंचको मायासे कल्पित देखने लगा। इस प्रकार वर्षा और शरद् दोनों ऋतुओंभर वे महात्मा प्रतिदिन भगवान्के निर्मल यशका गान करते रहे, जिसके सुननेसे मेरे हृदयमें रजोगुण और तमोगुणको नाश करनेवाली सात्त्विकी भक्ति उत्पन्न हो गयी। मुझको अनुरागी, आश्रित, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु और