प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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कहीं भी रुकावट नहीं है। स्वयं भगवान्की दी हुई इस स्वरमय ब्रह्मसे विभूषित वीणाको बजाकर हरिगुण गाता हुआ मैं सर्वत्र विचरता हूँ। भगवान्की मुझपर इतनी अपार कृपा है कि जब मैं प्रेमसे गद्गद होकर भगवान्की लीला गाता हूँ, तभी मंगलकीर्ति पूज्यचरण भगवान् उसी क्षण प्रकट होकर मुझे ऐसे दर्शन देते हैं, जैसे कोई किसीके पुकारते ही शीघ्र आ जाता है। जो लोग भोगोंकी इच्छासे बार-बार व्यग्रचित्त होकर संसारके विषय-भोगोंमें आसक्त हैं, उनके संसारसागरसे तरनेके लिये केवल श्रीहरिचर्चा ही दृढ़ नौका है। इसीलिये मैं अपने और लोगोंके कल्याणके लिये सदा-सर्वदा हरिगुणगान करता हुआ विचरण करता हूँ। 'भगवान् श्रीहरिके भजनसे विषयी पुरुषोंका चित्त जितना शीघ्र शान्त होता है उतना योगादिके द्वारा नहीं होता।' इतना कहकर हरिगुण गाते हुए श्रीनारदजी वहाँसे चल दिये। महाभारतमें कहा है कि देवर्षि नारदजी समस्त वेदोंके तत्त्वज्ञ, देवताओंके पूज्य, इतिहास-पुराणोंके विशेषज्ञ, अतीत कल्पोंकी बातोंको जाननेवाले, धर्म-तत्त्वके ज्ञाता, शिक्षा-कल्प- व्याकरणके असाधारण पण्डित, संगीतविशारद, परस्पर-विरुद्ध विधिवाक्योंकी मीमांसा जाननेवाले, वाक्योंका पृथक्करण करनेमें पूर्ण योग्य, प्रभावशाली, व्याख्यानदाता, मेधावी, स्मृतिवान्, नीतिशील, कवि, ज्ञानी, समस्त प्रमाणोंद्वारा वस्तुका विचार करनेमें समर्थ, बृहस्पति-जैसे विद्वानोंकी शंकाओंका समाधान करनेवाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले, योगबलसे समस्त दिशाओंसे परिपूर्ण भूमण्डलके प्रत्यक्षदर्शी, मोक्षाधिकारके ज्ञाता, कल्याणके लिये विवाद खड़ा कर देनेवाले, सन्धि और विग्रहके सिद्धान्तोंके ज्ञाता, अनुमानसे ही कार्यका तत्त्व जाननेवाले,