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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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प्रेममें अनन्यता सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात् ॥ ७ ॥ ७-वह (प्रेमाभक्ति) कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है। यह प्रेमाभक्ति सर्वथा त्यागरूप है। इसमें धन, सन्तान, कीर्ति, स्वर्ग आदिकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी कामना नहीं रह सकती। जिस भक्तिके बदलेमें कुछ माँगा जाता है या कुछ प्राप्त होनेकी आशा या आकांक्षा है, वह भक्ति कामनायुक्त है, वह स्वार्थका व्यापार है। प्रेमाभक्तिमें तो भक्त अपने प्रियतम भगवान् और उनकी सेवाको छोड़कर और कुछ चाहता ही नहीं। श्रीमद्भागवतमें भगवान् कपिलदेव कहते हैं कि 'मेरे प्रेमी भक्तगण मेरी सेवा छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य (इन पाँच प्रकारकी*) मुक्तियोंको देनेपर भी नहीं लेते।' यथार्थ भक्तिके उदय होनेपर कामनाएँ नष्ट हो ही जाती हैं। क्योंकि वह भक्ति निरोधस्वरूपा यानी त्यागमयी है। वह निरोध क्या है? निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः ॥ ८ ॥ ८-लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मोंके त्यागको निरोध कहते हैं।

  • पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ ये हैं— सालोक्य—भगवान्‌के समान लोकप्राप्ति। सार्ष्टि—भगवान्‌के समान ऐश्वर्यप्राप्ति। सामीप्य—भगवान्‌के समीप स्थानप्राप्ति। सारूप्य—भगवान्‌के समान स्वरूपप्राप्ति। सायुज्य—भगवान्‌में लयप्राप्ति।