प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ प्रेम-दर्शन इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने प्रियतम भगवान्को ही जानकर, उसीको सर्वस्व मानकर, जैसे मछलीको केवल जलका आश्रय होता है, वैसे ही केवल भगवान्का ही आश्रय लेकर सारी चेष्टाएँ उसीके लिये करता है। एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास। एक राम घनस्याम हित चातक 'तुलसीदास'॥ वह चातककी टेककी भाँति केवल भगवान्में ही चित्त लगाये, सम्पूर्णरूपसे उसीपर निर्भर करता हुआ, उसीके लिये शरीर धारण करता है। उसका खाना-पीना, सोना-बैठना, चलना-फिरना, देना- लेना, दान-पुण्य करना, सब कुछ उसीके लिये होता है। अतएव उसके समस्त कर्म भगवान्के प्रति अनन्य प्रेमभावसे सम्पन्न होनेके कारण स्वाभाविक ही कल्याणमय होते हैं। लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता ॥ ११ ॥ ११-लौकिक और वैदिक कर्मोंमें भगवान्के अनुकूल कर्म करना ही उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनता है। अनन्य भावसे भगवदर्थ कर्म करनेवालेके लिये भगवान्के प्रतिकूल कर्मोंका अपने-आप ही त्याग हो जाता है। वैदिक या लौकिक (श्रौत या स्मार्त), कोई भी ऐसा कर्म वह नहीं कर सकता जो भगवान्के अनुकूल न हो, यानी जिससे प्रेमाभक्तिकी वृद्धिमें सहायता न पहुँचती हो। पुत्रके लिये माता-पिताकी, स्त्रीके लिये स्वामीकी और शिष्यके लिये गुरुकी आज्ञा मानना वेद और लोक-धर्मके अनुसार सर्वथा कर्तव्य है; परन्तु उनकी आज्ञा भी यदि भगवत्-प्रेमसे विरुद्ध है तो प्रेमी भक्त कष्ट सहकर भी उसका त्याग कर देता है, क्योंकि उसके द्वारा अपने प्यारेके प्रतिकूल आचरण होना असम्भव है। गोस्वामीजी महाराजने उदाहरण देते हुए कहा है—