प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ॥ १५ ॥ १५-अब नाना मतोंके अनुसार उस भक्तिके लक्षण कहते हैं। विभिन्न आचार्योंने भक्तिका स्वरूप भिन्न-भिन्न रूपसे बतलाया है, पहले उनका वर्णन करके फिर देवर्षि नारदजी अपना मत दिखलाना चाहते हैं। पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः ॥ १६ ॥ १६-पाराशरनन्दन श्रीव्यासजीके मतानुसार भगवान्की पूजा आदिमें अनुराग होना भक्ति है। अपने तन, मन, धनको भगवान्की पूजन-सामग्री समझना और परम श्रद्धापूर्वक यथाविधि तीनोंके द्वारा भगवान्की प्रतिमाकी अथवा विश्वरूप भगवान्की पूजा करनी चाहिये। भगवत्-पूजामें मन लगनेसे संसारके बन्धनकारक विषयोंसे मन अपने-आप ही हट जाता है। बाह्य और मानस दोनों ही प्रकारसे भगवान्की पूजा होनी चाहिये। भगवत्की पूजासे भगवान्का परमपद प्राप्त होता है— श्रीविष्णोरर्चनं ये तु प्रकुर्वन्ति नरा भुवि। ते यान्ति शाश्वतं विष्णोरानन्दं परमं पदम्॥ (विष्णुरहस्य) 'इस धरातलमें जो लोग भगवान्की पूजा करते हैं वे सनातन आनन्दमय परमपदको प्राप्त होते हैं।' कथादिष्विति गर्गः ॥ १७ ॥ १७-श्रीगर्गाचार्यके मतसे भगवान्की कथा आदिमें अनुराग होना ही भक्ति है।