प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ प्रेम-दर्शन गौरमुख हिमकरनकी जु किरनावली, स्रवत मधु गान हिय पिय तरंगी। 'नागरी' सकल संकेत आकारिनी, गनत गुनगननि मति होति पंगी॥ एक व्रजभक्तने कहा है— ये हरिरस ओपी गोपी सब तियतें न्यारी। कमलनयन गोविंदचंदकी प्रानपियारी॥ निरमत्सर जे संत तिनहिं चूड़ामनि गोपी। निरमल प्रेम प्रबाह सकल मरजादा लोपी॥ जे ऐसे मरजाद मेटि मोहन गुन गावैं। क्यों नहिं परमानंद प्रेमभगती सुख पावैं॥ गोपियोंकी महिमा तभी कुछ समझमें आ सकती है, जब साधक विषयोंसे परम वैराग्य धारणकर प्रेमपथपर कुछ अग्रसर होता है। तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ॥ २२॥ २२-इस अवस्थामें भी (गोपियोंमें) माहात्म्यज्ञानकी विस्मृतिका अपवाद नहीं। अर्थात् गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके प्रभाव, रहस्य और गुणोंको जानती थीं। कुछ लोगोंका कहना है कि प्रेममें माहात्म्यज्ञान नहीं रहता। माहात्म्यज्ञान होगा तो प्रेम नहीं रहेगा, परन्तु गोपियोंमें ऐसी बात नहीं थी। गोपियाँ श्रीकृष्णको साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान् जानती हुई ही अपना प्रियतम समझती थीं। लौकिक प्रेम और भगवत्प्रेममें यही खास भेद है। भगवत्प्रेममें वस्तुतः ऐसा ही होता है। जो लोग कहते हैं कि गोपियाँ श्रीकृष्णको भगवान् नहीं जानती थीं, वे श्रीमद्भागवतके नीचे लिखे श्लोकोंका मनन करें— मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं संत्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।