भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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५० प्रेम-दर्शन आदिपुरुष श्रीनारायण मुमुक्षुओंको भजते हैं, (उनके इच्छानुसार उन्हें स्वीकार करते हैं) उसी प्रकार आप हमें अंगीकार कीजिये, त्यागिये नहीं। हे हरि! आप धर्मको जाननेवाले हैं (फिर आप कैसे कहते हैं कि तुमलोग लौट जाओ, आपकी शरण आनेपर भी क्या कोई कभी वापस लौटता है)। आपने जो कहा कि पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका परम धर्म है, सो यह उपदेश उपदेशके स्थान आप ईश्वरके विषयमें ही रहे; क्योंकि समस्त देहधारियोंके प्रियतम बन्धु और आत्मा तो आप ही हैं। हे कमललोचन! जिस समय श्रीलक्ष्मीजीको (श्रीविष्णुरूपमें) कभी-कभी आनन्दित करनेवाले आपके चरण- कमलोंको हमने स्पर्श किया था और वनवासी तपस्वियोंके प्रिय आपने हमें आनन्दित किया था, तभीसे हमारे लिये अन्यत्र कहीं ठहरना असम्भव हो गया है। जिनकी कृपादृष्टि पानेके लिये देवगण अत्यन्त प्रयास करते हैं, वे लक्ष्मीजी बिना किसी प्रतिद्वन्द्वीके आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी तुलसीजीके सहित अन्य भक्तोंसे सेवित आपकी चरणरजकी इच्छा करती हैं, हम भी निस्सन्देह आपकी उसी चरणरजकी ही शरणमें आयी हैं। क्योंकि देवताओंकी रक्षा करनेवाले आप आदिपुरुष परमात्मा ही व्रजमण्डलका भय और दुःख दूर करनेके लिये प्रकट होकर अवतीर्ण हुए हैं। यह निश्चय है कि आप केवल यशोदाके ही पुत्र नहीं हैं, वरं समस्त देहधारियोंके अन्तरात्माके साक्षी हैं। हे सखे! ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही आपने सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करनेके लिये यदुकुलमें अवतार लिया है।' ऐसे अनेकों प्रमाणोंसे तथा युक्तियोंसे यह सर्वथा सिद्ध है कि गोपियोंने श्रीकृष्णको साक्षात् सच्चिदानन्दघन भगवान् समझकर ही उन्हें आत्मसमर्पण किया था।