भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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५४ प्रेम-दर्शन मुझको योग, ज्ञान, धर्म, स्वाध्याय, तप और त्याग वशमें नहीं कर सकते। सन्तोंका प्रिय आत्मारूप मैं केवल श्रद्धायुक्त भक्तिके द्वारा वशमें हो सकता हूँ, मेरी भक्ति चाण्डाल आदिको भी पवित्रहृदय बनानेमें समर्थ है।' इसी प्रकार श्रीभगवान्ने गीतामें भी कहा है— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥ (११।५३-५४) 'हे अर्जुन! जैसा तुमने मुझको देखा है, ऐसा वेद, तप, दान, यज्ञ आदिसे मैं नहीं देखनेमें आता। हे परंतप अर्जुन! अनन्यभक्तिके द्वारा ही इस प्रकार मेरा देखा जाना, मुझे तत्त्वसे जानना और मुझमें प्रवेश पाना सम्भव है।' फलरूपत्वात् ॥ २६ ॥ २६-क्योंकि (वह भक्ति) फलरूपा है। वस्तुतः यह भक्ति फलरूपा है, साधन नहीं है। जो भक्ति ज्ञानका साधन मानी जाती है, वह गौणी भक्ति साधारण उपासना है, प्रेमरूपा भक्ति नहीं है। प्रेमरूपा भक्ति तो समस्त साधनोंका फल है। तीर्थाटन साधन समुदाई जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥ नाना कर्म धर्म ब्रत दाना संजम दम जप तप मख नाना॥ भूत दया द्विज गुर सेवकाई बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥ जहाँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥ ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च ॥ २७ ॥ २७-ईश्वरको भी अभिमानसे द्वेषभाव है और दैन्यसे प्रियभाव है।