भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६९ नामापराधोंसे* बचते हुए भगवान्‌के नामका जप-कीर्तन और श्रवण अवश्य ही करना चाहिये। श्रीमद्भागवतमें कहा है— साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा। वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥ अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तमश्लोकनाम यत्। संकीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानलः॥ (६।२।१४,१८) 'पुत्रादिके नामसंकेतसे, परिहासमें, स्तोभ या अवहेलनासे भी भगवान्‌का नाम लेनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। अज्ञान अथवा ज्ञानपूर्वक लिया हुआ पुण्यश्लोक भगवान्‌का नाम मनुष्यके पापको उसी प्रकार जला देता है जैसे अग्निमें किसी प्रकारसे भी डाला हुआ ईंधन भस्म हो जाता है।' सभी सद्ग्रन्थों और संतोंकी वाणियोंमें भगवन्नामकी महिमा गायी गयी है। श्रीमद्भागवतके निम्नलिखित श्लोक मनन करनेयोग्य हैं। देवी देवहूतिजी भगवान् कपिलदेवसे कहती हैं— अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ (३।३३।७)

  • नामके दस अपराध ये हैं—१-सन्तोंकी निन्दा, २-भगवान्‌के नामोंमें छोटे- बड़ेका भेद-भाव, ३-गुरुका अपमान, ४-शास्त्रनिन्दा, ५-नाममें अर्थवाद (अर्थात् यह समझना कि यह केवल प्रशंसामात्र है, ऐसा फल नहीं होता) मानना, ६-नामका सहारा लेकर पाप करना, ७-धर्म, व्रत, दान और यज्ञादिके साथ नामकी तुलना करना, ८- अश्रद्धालु, हरिविमुख और सुनना न चाहनेवालोंको नामका उपदेश करना, ९- नाममाहात्म्य सुनकर भी उसमें प्रेम न करना और १०-अहंकार, ममता तथा भोगादि विषयोंमें आसक्त रहना।