प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७५ महापुरुषके अज्ञात संगसे भी पाप और अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश होकर ज्ञानरूप सूर्यका प्रकाश और प्रेमरूप परमनिधि तो मिल जाती है, परन्तु जबतक इस बातका पता नहीं लगता तबतक इस लाभसे अपरिचित रहनेके कारण मनुष्य आनन्दको प्राप्त नहीं होता। अवश्य ही इस स्थितिका परिचय मिलनेमें अधिक विलम्ब नहीं होता। इसीसे महत्संगको अमोघ (अवश्य फलदायी) बतलाया गया है। लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव ॥ ४० ॥ ४०-उस (भगवान्)-की कृपासे ही (महत्पुरुषोंका) संग भी मिलता है। अवश्य ही ऐसे सन्तका मिलन हरि-कृपासे ही होता है। भगवान् जिसपर कृपा करके अपनाना चाहते हैं, उसीके पास, प्रेमपाशमें अपनेको बाँध रखनेकी शक्तिवाले, अपने ही स्वरूपभूत प्रेमी भक्तको भेजते हैं। वस्तुतः भगवत्कृपा और महान् पुरुषोंका संग एक-दूसरेके आश्रित हैं। महत्पुरुषोंके संग बिना भगवत्कृपाका अनुभव नहीं होता और भगवत्कृपा बिना ऐसे महापुरुष नहीं मिलते। श्रीविभीषणको भी श्रीहनूमान्जीके मिलनेपर ही भगवत्कृपाका अनुभव हुआ, इसीसे उन्होंने कहा— अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता॥ तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ॥ ४१ ॥ ४१-क्योंकि भगवान्में और उनके भक्तमें भेदका अभाव है। भगवान्के भक्त भगवत्स्वरूप ही हैं (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति) जो भक्तोंका सेवन करते हैं वे भगवान्का ही सेवन करते हैं। भक्त भगवान्के हृदयमें बसते हैं और भगवान् भक्तके हृदयमें। भगवान्ने कहा है—