भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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११२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता हविर्निवेद्य देवाय गुरुः शेषं समापयेत् । तत्र त्वाचार्यमभ्यर्च्य भोजयेद् वैष्णवानपि ॥२७॥ इनको त्रयोदश, द्वादश, चार अथवा एक ही संख्या में ऊर्ध्वपुण्ड्रों को अंत में नमः कहकर (ध्यान कर) लगाना चाहिए। तथा बाद में अपने अपने स्थानों पर इनकी स्थापना की जावे। यहां बारह ऊर्ध्वपुण्ड्रों पर केशव आदि देवों को स्थापित क तथा यदि सभी देवों को एक ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाया हो तो केशव को ललाट प और वासुदेव को गले के प्रदेश में एक ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया जाता है, तथा च ऊर्ध्वपुण्ड्र के लगाने के पक्ष में चारों ऊर्ध्वपुण्ड्रों को व्यूहों पर लगावे। इसके उपरा उन सभी केशवादि को प्रणाम कर सदा सान्निध्य के लिये प्रार्थना करे। इसी कार वैष्णव का शरीर श्रीविष्णु का निवास स्थान माना जाता है। इतना होने पर आचा उन देवों को हवि निवेदन करे तथा अर्चन की शेष विधि को पूर्ण कर समाप्त क इसके पश्चात् शिष्य आचार्य की सम्भावनापूर्वक पूजन करे। उत्सव के उपलक्ष अन्त में वैष्णवों को प्रसादादि देकर भोजन करवाया जाए॥२४-२७॥ करिष्यन् वैष्णवं नाम वैष्णवाश्रयमेव वा । पुण्येऽहनि गुरुः स्नात्वा पूजयित्वा जगद्गुरुम् ॥२८॥ पूर्ववत् स्थण्डिलं कृत्वा पूर्ववत् सिकतामये । षोडशे पीठमभ्यर्च्यवाहयेन्नामदेवताम् ॥२९॥ नाम संस्कार की दशा में वैष्णव नाम को अथवा वैष्णवाश्रय के अर्थ वाले नाम करने की कामना से आचार्य किसी पुण्यदिन अथवा शुभमुहूर्त में प्रथम स्नान क तथा जगद्गुरु श्रीनारायण का अर्चन करे। तत्पश्चात् पूर्वकथित विधि के अनुसा स्थण्डिलादि का निर्माण कर उस पर सिकतादि स्थानों को तैयार कर षोड़श प पर देवतादि का स्थापनादि करे तथा उनकी अर्चना कर नाम देवताओं का आवाह करे॥२८-२९॥ भगवद्रूपिणं ध्यात्वा हविरन्तमथार्चयेत् । उपपन्ने ततः शिष्ये कौपीनं कटिबन्धनम् ॥३०॥ निवेद्य वस्त्रे च नवे तस्मै तं ग्राहयेद्गुरुः । तच्छेषं गन्धमाल्यादि तथा चान्नं निवेदितम् ॥३१॥ नाम दासादिसिद्धान्तं श्रावयेत् केवलं तु वा । परित्य प्रणतोऽम्यर्च्य देवतां हृदि निक्षिपेत् ॥३२॥ तब गुरु अपने शिष्य से कौपीन तथा कटिबन्धन दो नवीन वस्त्रों को प्राप्त कर शिष्य बनाए और उसी शिष्य को कौपीन आदि पहनवाये। और जो शिष्य कौ