नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर लेंगे॥३२॥ गुरुणा योऽभिमन्येत गुरुं वा योऽभिमन्यते । तावुभौ परमां सिद्धिं नियमादुपगच्छतः ॥३३॥ अतः जो अपने गुरु को प्रपत्ति के साथ न्यासयोग की भावना से श्रद्धाभाव से समर्पित करे तथा जो अपने प्रपत्ति के अनुष्ठान के पूर्णतः सम्पन्न होने के बाद भी न्यासयोग की सिद्धि में उनके कारण बनने की कृपा की अतिशय कृतज्ञभाव से बुद्धि रखे तो ये दोनों ही प्रकार के साधक नियमतः परमसिद्धि की प्राप्ति कर लेते हैं॥३३॥ ज्ञानतस्त्वनुपेतस्य ब्रह्मचर्यमभीप्सतः । वृथैवात्मसमित्क्षेपो जायते कृष्णवर्त्मनि ॥३४॥ जो केवल पुस्तकादि के पठन से ज्ञान प्राप्त कर आचार्य के आश्रय ग्रहण करने के बिना ही प्रपत्ति का अनुष्ठान कर ब्रह्मचर्य की प्राप्ति (मोक्षादि) की अभिलाषा रखते हैं तो उनका निक्षेप या न्यासयोग अग्नि में फेंक दी जाने वाली समिधाओं के दाह की तरह वृथा होता है॥३४॥ शास्त्रादिषु सुदृष्टोऽपि साङ्गं सह फलोदया । न प्रसीदति वै विद्या विना सदुपदेशतः ॥३५॥ अतएव जैसे भली प्रकार से शास्त्रादि के ज्ञान के साङ्ग प्राप्त कर लेने पर भी बिना गुरु के उत्तम अनुभव सहित उपदेश के प्राप्त न होने पर फलोन्मुखी ब्रह्मविद्या भी ठीक से फल देनेवाली नहीं होती है॥३५॥ कामं लोकप्रमाणस्य कामाः सिध्यन्ति कामिनः । गृहीतसत्यदस्त्वैव निरपायफलोदयः ॥३६॥ प्रत्यक्षादि लोक प्रमाणों से इष्टसाधनों के प्रमाणित भाव के ग्रहण करने के बाद भी लौकिक पदार्थों से साधित हो जाने से किसी कामना करनेवाले साधक की सिद्धि हो परन्तु अलौकिक प्रमाण से सिद्ध होनेवाले मोक्षादि फल की प्राप्ति आचार्य की दीक्षा के अधीन रहने से सहज ही प्राप्त नहीं हो सकेगी। अतः ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिये आचार्यौपसत्ति ही अपेक्षित है॥३६॥ न्यासे वाप्यर्चने वाऽपि मन्त्रमेकान्तिनः श्रयेत् । अवैष्णवोपदिष्टेन मन्त्रेण न परा गतिः ॥३७॥ १ यहाँ ब्रह्मचर्य पद का आशय है परब्रह्म की अनुभूति करते हुए उसके किङ्कर भाव या सामीप्य प्राप्ति की इच्छा करना। इस करिका की अन्य व्याख्या है कि जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो ऐसे व्यक्ति का जैसे ब्रह्मचर्य का आचरण करना वैसे ही वृथा है जैसे अग्नि में बिना विधि तथा मन्त्रों के समिधा का क्षेप या समर्पण करना।