नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । एकान्तिनः स्वधर्मस्थाः सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥३१॥ इसी प्रकार ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक भी श्री विष्णु के प्रति प्रपत्ति रख एकान्तभाव से अपने अपने धर्मों के व्रतों में स्थित रहते हुए परम गति को प्राप्त करते हैं॥३१॥ नित्योप्तकेशा निभृतास्त्यक्तसर्वपरिग्रहाः । स्त्रीशूद्राद्याः स्वधर्मेण वर्तेरञ्जगतीपतौ ॥३२॥ ऐसे स्त्री, शूद्र आदि जो कि धन दारा आदि के परिग्रह से रहित होकर सदा ही अपने केशों का मुण्डन करवाकर निश्छल भाव से जगद्गुरु श्री विष्णु के प्रति अपने दीक्षादि से विहित आचारों का पालन करते हुए स्वधर्म का पालन करते रहें॥३२॥ वर्णाश्रमपराश्चैव परेऽपि हरिसंश्रिताः । अपायैर्नावसीदन्ति स्वेषु धर्मेष्ववस्थिताः ॥३३॥ चारों वर्ण तथा चारों आश्रमों से भिन्न जो अनुलोम प्रतिलोमादि जातियां हैं वे भी श्रीहरि की प्रपत्ति ग्रहण कर अपने विहित धर्मों में स्थित रहते हुए किसी अभाव या कष्ट से नष्ट नहीं होते हैं॥३३॥ समाश्रितो दास्यरतिं पतिं विश्वस्य माधवम् । यथार्हमाचरन् धर्मान् भूयो दृष्ट्यादि संश्रयेत् ॥३४॥ विश्व के अधिपति श्रीपति विष्णु के प्रति दास्यभाव की अभिरति रखते हुए उनका आश्रय लेकर अपने योग्य वर्णाश्रम धर्म का आचरण करते हुए साधक को बार बार इष्ट के ज्ञान तथा दृष्टि के साथ सभी चिन्ह, भक्ति तथा सत्सेवा आदि सभी आश्रय लेकर स्थित रहना चाहिए॥३४॥ प्रतिष्ठां सर्वधर्माणां प्रसादैकात्मनां हरेः । तदाज्ञारूपमनघं शास्त्रश्रुत्यादि मानयेत् ॥३५॥ श्रीविष्णु के प्रसाद मात्र फलवाले सभी धर्म प्रतिष्ठा से युक्त स्थित माने गये हैं अतएव भगवदाज्ञारूप तथा निष्पापरूपी अपौरुषेयरूप नित्य रूप वाले वेदादि तथा शास्त्रादि को भी पुरुषार्थ में अनुगत प्रमाणभूतरूप में श्रद्धा से मान्य करे॥३५॥ साङ्गान् वेदानधीयीत न्यायैश्चार्थं विचारयेत् । विद्यात् कर्मादिकं यत्र विष्णोराराधनात्मकम् ॥३६॥ अतएव साङ्गवेदों का अध्ययन कर स्वाध्याय संस्कार किया जावें, न्यायादि