भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

७० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता स्तम्भन, उच्चाटन आदि अन्य अद्भूत कर्मों की साधना न करे॥१०॥ न विपत्तिषु वैकल्यं नोदयेषु समुन्नतिम् । न कामेषु प्रसक्तिञ्च भजेदच्युतमानसः ॥११॥ वह विपत्ति के अवसर पर अधीरता (वैकलव्य) तथा उदय एव उन्नति की दशा में उन्नतभाव न रखे। वह भोगादि में अतिशय संगभाव भी न रखकर एकाग्रमन से स बिना स्थितियों के प्रभावों के श्री अच्युत का भजन करता रहे॥११॥ विनिन्दितः प्रशस्तो वा विमतः सम्मतोऽपि वा । विलुप्तोऽभ्यर्चितो वापि विक्रियेत न तत्ववित् ॥१२॥ वह तत्वभूत श्रीविष्णु का स्मरण तथा ज्ञान रखते हुए अपनी दुर्जनों के द्वारा निन्द के किये जाने या सद्गुणों के कारण स्तुति किये जाने, किसी के अविश्वास से चाहने पर अथवा किसी के विश्वासपात्र हो जाने की स्थिति में, किसी से अपमानित (विलप्त) अथवा आदर प्रदान करने की दशा में (को प्राप्त करने पर) हर्ष य शोकादि विकारों को प्राप्त न करे॥१२॥ न च क्रियान्तरङ्गाणां नायस्येदप्यसम्भवे । हानिं निवेद्य देवाय मनसैव प्रपूरयेत् ॥१३॥ वह अपने इष्टदेव की अर्चना में अपेक्षित द्रव्यों के सम्भव या प्राप्त न होने प अधिक प्रयास न करे या बिल्कुल ही न मिलने पर अधिक प्रयास न करे या बिल्कु ही न मिलने पर दुष्करायास भी न करते हुए इष्टदेव को उस पदार्थ का अभा निवेदित करते हुए केवल उस पदार्थ को मन से निवेदित कर दे (तथा वह न प्राप्त हो वाले पदार्थों की मानसिक भाव से पूर्ति कर लेवे)॥१३॥ वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि सर्वाण्यस्खलितः शुचिः । प्रवृत्तेः कारणञ्चात्र कामक्रोधादिकं त्यजेत् ॥१४॥ वह पवित्रभाव में स्थित रहते हुए बिना किसी अर्चनादि की त्रुटि करते हुए सभ निषिद्ध कार्यों तथा पदार्थों का परित्याग कर दे तथा इन प्रतिषिद्धों में अपनी प्रवृ जाने के कारणभूत काम तथा क्रोधादि की वृत्तियों का भी वह परित्याग क देवे॥१४॥ अगम्यागमनं हिंसामभक्ष्याणाञ्च भक्षणम् । असत्यवचनं स्तेयं तद्गत्सङ्गाँश्च वर्जयेत् ॥१५॥ वह परदारादि अगम्यगमन, हिंसादि कर्मों, अभक्ष्यपदार्थों का भक्षण, अस सम्भाषण जैसे कर्मों, चोरी आदि दुष्कर्मों (पापाचरण) को तथा ऐसे कार्यों करनेवालों की संगति का भी परित्याग कर दे॥१५॥