नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विशुद्धज्ञानकर्माणः श्रौतदिव्यार्षवर्त्मभिः । भक्तिनिष्ठाः परं ब्रह्म नारायणमुपासते ॥१०॥ इनमें प्रथम “ईशभक्तिफलोपाय स्वरूप वाले (वैष्णव) फल की आकांक्षा या आग्रह से हीन, ज्ञान तथा कर्मयोग के प्रति निष्ठावान् होते हैं जो भक्ति को साधनरूप मान लेते हैं। ये भक्तिनिष्ठ होकर मोक्षोपाय में विहित श्रौत, दिव्य-आगम तथा आर्ष- धर्मशास्त्रादि के द्वारा कथित पद्धति में स्थित रहकर उनका अनुसरण करते हुए नारायणरूप परब्रह्म की उपासना करते हैं॥१०॥ नारायणैकशरणाः फलं नारायणः स्वयम् । तैस्तैः स्वादुत्तमैः कल्पैर्यजन्तोऽनुभवन्ति वै ॥११॥ ऐसे जन एकमात्र नारायण को ही एकनिष्ठ भाव से उपाय मानते हैं तथा स्वयं नारायण ही उनका फलभूत प्राप्तव्य होता है। वे श्रौत, दिव्य तथा आर्ष कल्पों में कथित उत्तम विधियों के द्वारा अपने इष्ट की आराधना कर उनका दर्शनादि अनुग्रह का अनुभव करते हैं॥११॥ ये तु वाकनिषन्निष्ठास्तत्तत्संस्कारसंस्कृताः । ते वै भागवताः शुद्धा वासुदेवैकयाजिनः ।१२॥ इसी प्रकार जो ईश्वरोक्त मूलवाणी वेद तथा उपनिषद् आदि परमविद्या के द्वारा विहित संस्कारों से संस्कृत होकर पवित्रभाव से वासुदेव मात्र की यज्ञादि से आराधना करनेवाले अनन्य (एकनिष्ट) भक्त हैं उन्हें शुद्ध तथा भागवत समझना चाहिए॥१२॥ त्रय्या विहितसंस्कारास्त्रय्यन्ते परिनिष्ठिताः । यजन्त्येकान्तिनो मिश्रा विष्णुं विश्वतनुं हरिम् ॥१३॥ जिनके संस्कार वेदत्रयी से सम्पन्न हैं तथा इसी त्रयी के अन्त या शीर्षभूत उपनिषद्रूप वेदान्त शास्त्र में जो परिनिष्ठित ज्ञानवाले हैं वे एकान्तभाव से विश्व के शरीररूप सर्वव्यापी अन्तर्यामी श्री नारायण की स्वविहित यज्ञादि में श्रोतादि विधानों से आराधना करते हैं। ये भागवत भक्त मिश्र कोटि के समझना चाहिए॥१३॥ श्रूयते यत्र यष्टव्या यादृशी या हि देवता । तादृशी सा भवेत्तत्र यजन्त्येकान्तिनो हरिम् ॥१४॥ तथा वेद श्रुति के द्वारा जिस कर्म में जिस देवता के गुण विग्रह आदि दिखलाकर उसका यजन उपदिष्ट हो तो ऐसी जो भी देवता कर्म में विहित है उसी (प्रकार की) देवता में अन्तर्यामी हरि स्थित हैं ऐसा मान कर एकान्तभाव से उपासना करते हैं (तो उसी में श्रीहरि स्थित होकर (सर्वान्तव्यापी होने के कारण) उसके कर्मों का