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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

हिन्दीटीकासहित १६९ पृष्ठे | पृष्ठे वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि- ७० | वृक्षादीनाञ्च सर्वेषां- ७६ वर्जयेदन्यदेवानां- ७४ | वृत्तिं सन्तोऽनुभूयेमां- १६१ वर्ज्याः पाषण्डशैवाद्यै- ७४ | वृत्तिर्भगवतां हि- ११७ वर्णाश्रमपराश्चैव- ५४ | वृत्तिश्च विहिताचार- ४० वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं- ७६ | वृत्तेर्हिजीवितं गुप्ति- १६० वासःस्रग्गन्धधूपादि- १०१ | वृत्यङ्गमेवञ्च ततो- ८६ वासुदेवं प्रपन्नानां- ३९ | वृद्धानाचारसम्पन्ना- ६६ विद्यार्थसम्प्रयोगोऽपि- ८१ | वृद्धानाञ्चैव मुक्तानां- १५७ विद्या विभूषणं पुंस- ९९ | वेदवेदाङ्गतत्व- १०२,१४३ विनिन्दितः प्रशस्तो वा- ७० | वेदवेदान्तविज्ञानं- ४२ विनैव प्रतिषिद्धेन- ६९ | वेदवेद्यः स भगवान्- ५६ विपरीतार्थतत्वानि- १५६ | वेदानां सोपनिषदां- १५७ विप्रानैकान्तिनः प्राज्ञा- १२१ | वैदिका इव चाप्यन्ये- १४१ विमर्श इह दुःखानां- १४८ | वैदिकास्तान्त्रिकाश्चैव- ३५,३६ विमानमण्डपोद्यान- १४७ | वैराग्यतीरसुभगा- १४५ विरहानर्थपीडावमान- १५५ | वैवाहिको विधिर्धर्मो- १४९ विवाहयज्ञाध्ययन- ९५ | वैष्णवस्याङ्गशय्यायां- ९८ विशिष्टः परमैकान्ती- ८३ | व्यवस्थां पदवर्णादि- ५५ विशुद्धं वैष्णवं बिम्बं- १३६ | व्यामिश्रं पञ्चरात्रेऽपि- १२६ विशुद्धज्ञानकर्माणः- ९० | व्यामिश्रांश्चापि शुद्धांश्च- १२९ विशुद्धज्ञानसलिलां- १४५ | व्यामुग्धमतयः केचित्- १२५ विशुद्धपरिवारस्य- १२७ | व्यूहांश्चतुर्षु तान्- १११ विशुद्धयेद्विष्णुभक्तस्य- ५२ | व्रज तस्यैव चरणौ- ११४ विशेषाद्विष्णुभक्तेषु- ७९ | शङ्खचक्रप्रधानं हि- ६० विशेषेणाप्यनर्थेषु- १५८ | शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यै- ७५ विश्वात्मन्यात्मनो न्यासं- ३४ | शरण्यमिज्यं लक्ष्मीशं- ७१ विष्णोस्तत्संश्रयणाञ्च- १५३ | शान्तिं पुण्येपु देशेषु- १२१ विष्ण्वर्चनरहिते ग्रामे- ७३ | शान्तोऽनसूयुः श्रद्धावान्- ३५ विष्णोः सेवेत तीर्थानि- ५२ | शालग्रामशिलायान्तु- १३५ विष्णोरायतनान्नौ वा- ६० | शास्त्रादिषु सुदृष्टापि- ३२ विष्णोरूर्ध्वतया क्षेत्रे- ६१ | शिष्टैर्वर्णाश्रमादीनां- ५५ विष्णोर्ध्यानप्रणामार्चा- ६८ | शिष्यपुत्रकलत्राणां- १०० विष्णोर्निवेदितान्नाद्यै- ५२ | शुद्धव्यामिश्रपात्राणां- १३७ विष्णोर्विद्वेषयुक्तस्य- १५९ | शुद्धादीनान्तु धर्माणां- १२७ विष्वक्सेनः स्मृतो नेता- ६८ | शुद्धो मिश्रस्तथान्यौ वा- १२७ विहिताचरणं कर्म- ४३ | शुश्रूषमाणः शूद्रोऽपि- ५३ विहितान्तर्गतान्येव- ४३ | श्रद्धापूतभवैद्यस्य- १४० विहितैवमुपावृत्ति- १५१ | श्रीभूमिलीलासहितं- ११५ वीर्यं स्वकर्मधीर्दृष्टिः- १३३ | श्रुतिभिः पञ्चरात्रेण- १५६

१७० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता पृष्ठे | पृष्ठे श्रुतिस्मृतीतिहासाद्यै— १५१ | सर्वेषामुपचाराणा— १३५ श्रुत्वा तु सकलान् धर्मान्— २५ | सर्वैश्च लक्षणैर्युक्त— ९६ श्रुत्वादौ नारदात् सम्य— ८७ | स शिष्योऽथ गुरुः— ११४ श्रुत्वैव सहसोत्थान— १५४ | साङ्गान् वेदानधीयीत— ५४ श्रूयतां सम्प्रवक्ष्यामि— २६ | सात्विकं नाम शुद्धानां— ७८ श्रूयते यत्र यष्टव्या— ९० | साधनत्वाभिमत्या— ४५ श्रौतदिव्यार्षकल्पानां— ११६ | साप्सरो भूरिसङ्घस्य— १४७ संवत्सरमुपासीत— १३८ | सामान्या च विभक्ता च— १३३ संहारादिक्रमं कुर्या— ११४ | सुसूक्ष्मत्वादूहापत्वा— १६१ संहितोपनिषद्वस्मिं— ८६ | सेव्योऽयं कर्महस्ता— १३३ स एकान्त्यन्यविमुखो— ८० | सैषा सुदृष्टिर्व्याख्य— १४९ स एवोपर्युपर्यस्य— ४१ | स्तुतिर्नतिः परिक्रामः— १५१ सकृदेव कृतो न्यासो— १३२ | स्तोत्राणि कल्पनामानि— ५६ स च सर्वेषु लोकेषु— ८४ | स्त्रियः शूद्रादयश्चैव— ३४ सतां निषेवणं वापि— १३४ | स्त्रीणाञ्च पतिमित्रा— ३५ सतां पादोदकं पात्रे— १३७ | स्थानानि सैकतान्यत्र— ११० सतामनवकाशत्वात्— ९५ | स्थाने हेत्याहुतीनान्तु— ११३ सतामसेवनान्नित्य— १६० | स्थापनार्चनयात्रादि— १५१ सतामाचार्यमुख्यानां— १५६ | स्नानञ्च गुरुणा यत्र— ६५ सतामुत्क्रमणादेश्च— १५० | ज्ञातेभ्यश्च यथाकामं— १२१ सत्वजा मानसी— ३१ | स्नानप्रसाधनहविः— १५१ सत्सेवनमसत्सेवा— १०४ | स्वतः सङ्कल्पतश्चापि— १२८ सद्ब्रह्म वासुदेवाख्यै— १०२ | स्वपापसम्भवादेव— ३८ सन्तः सतोऽनुगृह्णन्ति— १०१ | स्वयं देहानुकूलानि— ६५ सन्तोऽनुपनतारब्ध— १३७ | स्वयं ब्रह्माणि निक्षिप्तान्— ११३ सप्तपूरुषविज्ञेये— ३३ | स्वयं वा भक्तिसम्पन्नो— ३३ समर्पितात्मनः श्रीशे— १३१ | स्वरूपरूपविभव— ५७ समानसुखदुःखत्वं— १५५ | स्वरूपस्य विनाशाय— १५९ समाप्तानि च कर्माणि— ४८ | स्वल्पापि हन्ति भूयांसं— १०४ समाश्रितो दास्यरतिः— ५४ | स्वाध्यायेनापि विदुषा— १३६ समित्पुष्प हविस्तोय— ९५ | स्वाभाविकोऽस्य सम्बन्धः— ४१ सम्भूय च कुले श्लाघ्ये— १३३ | स्वेशसम्बन्धविज्ञानं— ८० सर्वत्राग्निमुखस्यान्ते— १२२ | हरेः प्रियतमं ज्ञानं— १५८ सर्वपातकसम्प्राप्तौ— १२० | हरेः शुद्धतनोः शुद्धं— १२६ सर्वभूतान्तरात्मान— १२५ | हरेरालोकहीनानां— १५७ सर्वमङ्गलसंयुक्त— ११० | हरेराश्रितवात्सल्य— ५८ सर्वसंस्कारसंस्कारो— १०२ | हविर्निवेद्य देवाय— १०९ सर्वात्मना हि या वृत्तिः— १५३ | हीनाः परमसंस्कारैः— ११८ सर्वेषां याग एवायं— १३५ | हीनाहीनतमाश्रैव— ३१

कर्मकाण्ड सम्बन्धी हमारे कुछ प्रकाशन अन्त्येष्टि श्राद्ध कर्म पद्धति (संस्कृत) पत्राकार व पुस्तकाकार उपाकर्म पद्धति मूल "श्रावणी कर्म" के लिये परमोपयोगी ग्रह शांति-हिन्दी टीका सहित (शुक्ल यजुर्वेदोक्त)—इसमें मातृस्थापन पूजन आभ्युदीपक श्राद्ध पद्धति और ग्रहशांति है। यह यज्ञोपवीत तथा विवाहादि शुभ कर्म में बहुत उपयोगी है गौडीय श्राद्ध प्रकाश महानिबन्ध—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, (मूलमात्र, पत्राकार) सभी श्राद्ध, पितृकर्म संबंधी सभी वैष्णवादि पूजनादिकों का अपूर्व संग्रह नित्य कर्म प्रयोग माला—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, नित्य नियम के ६२ विषयों सहित। संस्कृत में प्रेत मञ्जरी—हिन्दी टीका सहित। वैतरणी दान प्रेतदाहविधि, दशाहादि श्राद्ध, एकादशाहश्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शय्यादानादि सपिंडी श्राद्ध, षोडश, मासिक श्राद्ध प्रयोग, त्रयोदशाहपद दानादि है। पुस्तकाकार व पत्राकार दोनों में उपलब्ध व्रतोद्यापन प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। मूलमात्र पत्राकार व सजिल्द में उपलब्ध सुगम विवाह पद्धति—(गंगाधारी)—हिन्दीटीकासहित सर्वदेव प्रतिष्ठा प्रकाश—पं० चतुर्थीलालजीकृत। सम्पूर्ण देवताओं की सर्वोत्तम प्रतिष्ठा विधि और प्रतिष्ठोपयोगी अनेकों प्रकार के कुंड, मण्डल, यंत्र आदि के चित्र बनाने तथा रंग पूरने की विधि भी है। संस्कार प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें षोडश संस्कार, लुप्त संस्कार प्रायश्चित, व्रात्यप्रायश्चित प्रयोग, पुनरुपनमन प्रकार इत्यादि सभी विषय है। मूल मात्र संस्कृत में। सजिल्द वासिष्ठी हवन पद्धति—हिन्दी टीका सहित विष्णु पूजन विधि—हिन्दी टीका सहित विवाह सोपांगविधि—'वालोवोधिनी' नामक हिन्दी टीका सहित शांति प्रकाश—स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें गणपत्यादि पूजन, पुण्याह वाचन, कलश स्थापनादि और विनायकादि ३० शांति प्रयोग तथा वास्तु शांति तथा वास्तु शांति प्रयोगादि समन्त्रक हैं। मूल मात्र पत्राकार सकाम शिवपूजन विधान हिन्दीटीकासहित—वैदिक, तांत्रिक मन्त्रों से शिव पूजन स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) प्रायः समस्त शुभकर्मों में पढ़ा जाता है। संध्योपासन—हिन्दीटीकासहित देवर्षि पितृतर्पण सहित हरिद्रामातृका पूजा—विवाहादि मंगल करने योग्य (चातुर्थीलाली) उपनयनपद्धति—सटिप्पणीका नवीन आवश्यक विषयों से अलंकृत 'यज्ञोपवीत संस्कार' कराने के लिये परमोयोगी

हमारे यहाँ से प्रकाशित कुछ रामानुज सम्प्रदाय-ग्रंथ अर्चावतार स्थल वैभव दर्पण-दिव्य देश तीर्थ यात्रा हि.टी.स. आल्वन्दार स्तोत्र-सान्वय हिन्दी टीका सहित ............ रामपटल-हिन्दीटीका सहित ............. द्राविडाम्नाय दिव्यप्रबंध-(संस्कृत अनुवाद) अनुवादक श्रीकांची जगदाचार्यसिंहासनाधीश प्रतिवादिभयंकर श्रीमदण्णङ्गराचार्य। सुदर्शनशतक-हिन्दी टीका और सुदर्शनकवच............ (बृहत्) स्तोत्ररत्नावली-प्रथम भाग ............. श्री गोंदाभक्ति चालीसा-(नवीन प्रकाशन) .......... धर्म शास्त्र-ग्रंथ आन्हिक कर्म सूत्रावली (मूलमात्र) शुक्ल यजुर्वेदी माध्यनन्दिन वाजसनेयि शाखा क्लों के लिये परमोपयोगी ........ कर्मविपाक-(नक्षत्र चरणगत) हिन्दी टीका सहित ........ धर्मसिन्धु-पं० मिहिरचन्द्रजी कृत हि .टी . सहित तथा पूर्वोक्त सर्वालंकारों से विभूषित। निर्णय सिन्धु-पं. ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत- हि.टी . सहित ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड भा .टी (बृहज्ज्योतिषार्णवान्तर्गत षष्ठ मिश्रस्कन्धोक्त) हिन्दी टीका सहित ........ व्रतराज-(दैवज्ञ कुल भूषण, याज्ञिक शिरोमणि संगमेश्वरोपाव्ह श्री विश्वनाथ शर्मा विरचित) सौभाग्य लक्ष्मी-हि .टी . सहित। इसमें लक्ष्मीदेवी के प्रसन्न करने के आधनीत स्त्रभूतो, कवच व सदाचारों का वर्णन है।

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