भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

११४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु। दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि। यं च वयं द्विष्मः।
—इस मन्त्रको पढ़ते हुए हथेलीमें जल लेकर नासिकासे उसका स्पर्श कराये और भीतरके काम-क्रोधादि शत्रु उस जलमें आ गये, ऐसी भावना करके दूर फेंक दे। इस प्रकार शत्रुवर्गको दूर भगाकर 'द्रुपदादिव मुमुचानः' इत्यादि मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको अपने सिरपर डाले। उसके बाद 'ऋतञ्च सत्यम्' इत्यादि मन्त्रसे अघमर्षण करके 'अन्तश्चरसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा एक ही बार जलका आचमन करे। देवर्षे! तदनन्तर सूर्यदेवको विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प और जलकी अञ्जलि दे। प्रातःकाल स्वस्तिकाकार अञ्जलि बाँधकर भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। मध्याह्नकालमें दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर और सायंकाल बाँहें नीचे करके उपस्थान करे। इस प्रकार प्रातः आदि तीनों समयके लिये पृथक्-पृथक् विधि है। नारदजी! सूर्योपस्थानके समय 'उदुत्यं जातवेदसम्', चित्रं देवानामुदगादनीकम्', 'तच्चक्षुर्देवहितम्' इन तीन ऋचाओंका जप करे। इसके सिवा सूर्यदेवता-सम्बन्धी अन्य मन्त्रोंका, शिव-सम्बन्धी मन्त्रोंका तथा विष्णुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रोंका भी जप किया जा सकता है। सूर्योपस्थानके बाद 'तेजोऽसि' तथा 'गायत्र्यस्येकपदी' इत्यादि मन्त्रोंको पढ़कर भगवान् सविताके तेजःस्वरूप गायत्रीकी अथवा परमात्म-तेजकी स्तुति-प्रार्थना करे। तदनन्तर पुनः तीन बार अङ्गन्यास करके ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णुकी स्वरूपभूता शक्तियोंका चिन्तन करे। (प्रातःकाल ब्रह्माकी, मध्याह्नमें रुद्रकी और सायंकाल विष्णुकी शक्तिरूपसे क्रमशः गायत्री, सावित्री और सरस्वतीका चिन्तन करना चाहिये। उनका क्रमशः ध्यान इस प्रकार है—)

ब्राह्माणी चतुराननाक्षवलयं कुम्भं करैः स्रुक्स्रुवौ
बिभ्राणारुणेन्दुकान्तिवदना ऋग्रूपिणी बालिका।
हंसारोहणकेलिखणखणमणेर्बिम्बार्चिता भूषिता
गायत्री परिभाविता भवतु नः संपत्समृद्ध्यै सदा॥
(ना० पूर्व०। २७। ५५)

'प्रातःकालमें गायत्रीदेवी ऋग्वेदस्वरूपा बालिकाके रूपमें विराज रही हैं। ये ब्रह्माजीकी शक्ति हैं। इनके चार मुख हैं। इन्होंने अपने हाथोंमें अक्षवलय, कलश, स्रुक् और स्रुवा धारण कर रखा है। इनके मुखकी कान्ति अरुण चन्द्रमाके समान कमनीय है। ये हंसपर चढ़नेकी क्रीड़ा कर रही हैं। उस समय इनके मणिमय आभूषण खनखन करने लगते हैं। मणिके बिम्बोंसे ये कूजित और विभूषित हैं। ऐसी गायत्रीदेवी हमारे ध्यानकी विषय होकर दैवी सम्पत्ति बढ़ानेमें सहायक हों।'

रुद्राणी नवयौवना त्रिनयना वैयाघ्रचर्माम्बरा
खट्वाङ्गत्रिशिखाक्षसूत्रवलयाऽभीतिः श्रियै चास्तु नः।
विद्युद्दामजटाकलापविलसद्बालेन्दुमौलिर्मुदा
सावित्री वृषवाहना सिततनुर्ध्येया यजूरूपिणी॥
(ना० पूर्व०। २७। ५६)

'मध्याह्नकालमें वही गायत्री 'सावित्री' नाम धारण करती हैं। ये रुद्रकी शक्ति हैं। नूतन