भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 770 में से

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  • संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रसादसे मुझे इन महापातकोंसे छुटकारा मिला है। मुनीश्वर ! आपके उपदेशसे मेरा संताप दूर हो गया और सम्पूर्ण पाप भी तुरंत नष्ट हो गये। मुने ! आपने मेरे ऊपर जो भगवान्‌का चरणोदक छिड़का है, उसके प्रभावसे आज मुझे आपने भगवान् विष्णुके परम पदको पहुँचा दिया। विप्रवर ! आपके द्वारा इस पापमय शरीरसे मेरा उद्धार हो गया; इसलिये मैं आपके चरणोंमें मस्तक नवाता हूँ। विद्वन् ! मेरे किये हुए अपराधको आप क्षमा करें।

ऐसा कहकर उसने मुनिवर उत्तङ्कपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की और विमानसे उतरकर तीन बार परिक्रमा करके उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर पुनः उस दिव्य विमानपर चढ़कर गुलिक भगवान् विष्णुके धामको चला गया। यह सब प्रत्यक्ष देखकर तपोनिधि उत्तङ्कजी बड़े विस्मयमें पड़े और उन्होंने सिरपर अञ्जलि रखकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका स्तवन किया। उनके द्वारा स्तुति करनेपर भगवान् महाविष्णुने उन्हें उत्तम वर दिया और उस वरसे उत्तङ्कजी भी परम पदको प्राप्त हो गये।


उत्तङ्कके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान्‌की आज्ञासे उनका नारायणाश्रममें जाकर मुक्त होना

नारदजीने पूछा— महाभाग ! वह कौन-सा स्तोत्र था और उसके द्वारा भगवान् विष्णु किस प्रकार संतुष्ट हुए? पुण्यात्मा पुरुष उत्तङ्कजीने भगवान्‌से कैसा वर प्राप्त किया?

श्रीसनकजीने कहा— भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले विप्रवर उत्तङ्कने उस समय भगवान्‌के चरणोदकका माहात्म्य देखकर उनकी भक्तिभावसे स्तुति की।

उत्तङ्कजी बोले— जो सम्पूर्ण जगत्‌के निवासस्थान और उसके एकमात्र बन्धु हैं, उन आदिदेव भगवान् नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ। जो स्मरण करनेमात्रसे भक्तजनोंकी सारी पीड़ा नष्ट कर देते हैं, अपने हाथोंमें चक्र, कमल, शार्ङ्गधनुष और खड्ग धारण करनेवाले उन महाविष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जिनकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे उत्पन्न होकर ब्रह्माजी इन सम्पूर्ण लोकोंके समुदायकी सृष्टि करते हैं और जिनके क्रोधसे प्रकट हुए भगवान् रुद्र इस जगत्‌का संहार किया करते हैं, उन आदिदेव भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जो लक्ष्मीजीके पति हैं, जिनके कमलदलके समान विशाल नेत्र हैं, जिनकी शक्ति अद्भुत है, जो सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र कारण तथा वेदान्तवेद्य पुराणपुरुष हैं, उन तेजोराशि भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो सबके आत्मा, अविनाशी और सर्वव्यापी हैं, जिनका नाम अच्युत है, जो ज्ञानस्वरूप तथा ज्ञानियोंको शरण देनेवाले हैं, एकमात्र ज्ञानसे ही जिनके तत्त्वका बोध होता है, जिनका कोई आदि नहीं है, यह व्यष्टि और समष्टि जगत् जिनका ही स्वरूप है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनके बल और पराक्रमका अन्त नहीं है, जो गुण और जातिसे हीन तथा गुणस्वरूप हैं, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, नित्य तथा शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले हैं, वे दयासागर परमात्मा मुझे वर प्रदान करें। जो स्थूल और सूक्ष्म आदि विशेष भेदोंसे युक्त जगत्‌की यथायोग्य रचना करके अपने बनाये हुए उस जगत्‌में स्वयं ही अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हुए हैं, वह परमेश्वर आप ही हैं। हे अनन्त शक्ति-सम्पन्न परमात्मन् ! वह सब जगत् आप ही हैं; क्योंकि आपसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। भगवन् ! आपका जो शुद्ध स्वरूप है वह इन्द्रियातीत,

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