संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
चरणोंमें नूपुर आदि आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनकी फहराती हुई ध्वजामें गरुड़का चिह्न सुशोभित था। इस रूपमें भगवान्का दर्शन करके विप्रवर उत्तङ्कने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया* और आनन्दके आँसुओंसे श्रीहरिके दोनों चरणोंको नहला दिया। फिर वे एकाग्रचित्त होकर बोले—'मुरारे! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' तब परम दयालु भगवान् महाविष्णुने मुनिश्रेष्ठ उत्तङ्कको उठाकर छातीसे लगा लिया और कहा—'वत्स! कोई वर
माँगो। साधुशिरोमणे! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।' भगवान् चक्रपाणिके इस कथनको सुनकर महर्षि उत्तङ्कने पुनः प्रणाम किया और उन देवाधिदेव जनार्दनसे इस प्रकार कहा—'भगवन्! मुझे मोहमें क्यों डालते हैं? देव! मुझे दूसरे वरोंसे क्या प्रयोजन है? मेरी तो जन्म-जन्मान्तरोंमें भी आपके चरणोंमें ही अविचल भक्ति बनी रहे।' तब जगदीश्वर भगवान् विष्णुने 'एवमस्तु' (ऐसा ही होगा) यह कहकर शङ्खके सिरेसे उत्तङ्कजीके शरीरका स्पर्श कराया और उन्हें वह दिव्य ज्ञान दे दिया जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। तदनन्तर पुनः स्तुति करते हुए विप्रवर उत्तङ्कसे देवदेव जनार्दनने उनके सिरपर हाथ रखकर मुसकराते हुए कहा।
श्रीभगवान् बोले— जो मनुष्य तुम्हारे द्वारा किये हुए स्तोत्रका सदा पाठ करेगा, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करके अन्तमें मोक्षका भागी होगा।
नारदजी! ब्राह्मणसे ऐसा कहकर भगवान् लक्ष्मीपति वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर उत्तङ्कजी भी वहाँसे बदरिकाश्रमको चले गये। अतः सदा देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी भक्ति करनी चाहिये। हरिभक्ति श्रेष्ठ कही गयी है। वह सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाली है। मुने! नरनारायणके आश्रममें जाकर उत्तङ्कजी क्रियायोगमें तत्पर हो प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान् माधवकी आराधना करने लगे। वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न थे। उनका द्वैतभ्रम नाश हो चुका था। अतः उन्होंने भगवान् विष्णुके दुर्लभ परम पदको प्राप्त कर लिया। भक्तोंका सम्मान बढ़ानेवाले जगदीश्वर भगवान् नारायण पूजन, नमस्कार अथवा स्मरण कर लेनेपर भी
* अतसीपुष्पसंकाशं फुल्लपङ्कजलोचनम्। किरीटिनं कुण्डलिनं हारकेयूरभूषितम् ॥
श्रीवत्सकौस्तुभधरं हेमयज्ञोपवीतिनम्। नासाविन्यस्तमुक्ताभवर्धमानतनुच्छविम् ॥
पीताम्बरधरं देवं वनमालाविभूषितम्। तुलसीकोमलदलैरर्चिताङ्घ्रिं महाद्युतिम् ॥
किङ्किणीनूपुराद्यैश्च शोभितं गरुडध्वजम्। दृष्ट्वा ननाम विप्रेन्द्रो दण्डवत्क्षितिमण्डले ॥
(ना० पूर्व० ३८ । ४०-४३)