भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 770 में से

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पृष्ठ 168

१६६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

अपनी प्रशंसा और दूसरोंकी निन्दा करनेवाले होंगे। नारदजी! कलियुगमें अधर्म ही लोगोंका भाई-बन्धु होगा। वे सब-के-सब विश्वासघाती, क्रूर और दयाधर्मसे शून्य होंगे। विप्रवर! घोर कलियुगमें बड़ी-से-बड़ी आयु सोलह वर्षकी होगी और पाँच वर्षकी कन्याके बच्चा पैदा होगा। लोग सात या आठ वर्षकी अवस्थामें जवान कहलायेंगे। सभी अपने कर्मका त्याग करनेवाले कृतघ्न तथा धर्मयुक्त आजीविकाको भंग करनेवाले होंगे। कलियुगमें द्विज प्रतिदिन भीख माँगनेवाले होंगे। वे दूसरोंका अपमान करेंगे और दूसरोंके ही घरमें रहकर प्रसन्न होंगे। इसी प्रकार दूसरोंकी निन्दामें तत्पर तथा व्यर्थ विश्वास दिलानेवाले लोग सदा पिता, माता और पुत्रोंकी निन्दा करेंगे। वाणीसे धर्मकी बात करेंगे, किंतु उनका मन पापमें आसक्त होगा। धन, विद्या और जवानीके नशेमें मतवाले हो सब लोग दुःख भोगते रहेंगे। रोग-व्याधि, चोर-डाकू तथा अकालसे पीड़ित होंगे। सबके मनमें अत्यन्त कपट भरा होगा और अपने अपराधका विचार न करके व्यर्थ ही दूसरोंपर दोषारोपण करेंगे। पापी मनुष्य धर्ममार्गका संचालन करनेवाले धर्मपरायण पुरुषका तिरस्कार करेंगे। कलियुग आनेपर म्लेच्छ जातिके राजा होंगे। शूद्र लोग भिक्षासे जीवन-निर्वाह करनेवाले होंगे और द्विज उनकी सेवा-शुश्रूषामें संलग्न रहेंगे। इस सङ्कटकालमें न कोई शिष्य होगा, न गुरु; न पुत्र होगा, न पिता और न पत्नी होगी न पति। कलियुगमें धनीलोग भी याचक होंगे और द्विजलोग रसका विक्रय करेंगे। धर्मका चोला पहने हुए मुनिवेषधारी द्विज नहीं बेचनेयोग्य वस्तुओंका विक्रय तथा अगम्या स्त्रीके साथ समागम करेंगे। मुने! नरकके अधिकारी द्विज वेदों और धर्मशास्त्रोंकी निन्दा करते हुए शूद्रवृत्तिसे ही जीवन-निर्वाह करेंगे।

कलियुगमें सभी मनुष्य अनावृष्टिसे भयभीत होकर आकाशकी ओर आँखें लगाये रहेंगे और क्षुधाके भयसे कातर बने रहेंगे। उस अकालके समय मनुष्य कन्द, पत्ते और फल खाकर रहेंगे और अनावृष्टिसे अत्यन्त दुःखित होकर आत्मघात कर लेंगे। कलियुगमें सब लोग कामवेदनासे पीड़ित, नाटे शरीरवाले, लोभी, अधर्मपरायण, मन्दभाग्य तथा अधिक संतानवाले होंगे। स्त्रियाँ अपने शरीरका ही पोषण करनेवाली तथा वेश्याओंके सौन्दर्य और स्वभावको अपनानेवाली होंगी। वे पतिके वचनोंका अनादर करके सदा दूसरोंके घरमें निवास करेंगी। अच्छे कुलोंकी स्त्रियाँ भी दुराचारिणी होकर सदा दुराचारियोंसे ही स्नेह करेंगी और अपने पुरुषोंके प्रति असद्व्यवहार करनेवाली होंगी। चोर आदिके भयसे डरे हुए लोग अपनी रक्षाके लिये काष्ठ-यन्त्र अर्थात् काठके मजबूत किवाड़ बनायेंगे। दुर्भिक्ष और करकी पीड़ासे अत्यन्त पीड़ित हुए मनुष्य दुःखी होकर गेहूँ और जौ आदि अन्नसे सम्पन्न देशमें चले जायँगे। लोग हृदयमें निषिद्ध कर्मका संकल्प लेकर ऊपरसे शुभ वचन बोलेंगे। अपने कार्यकी सिद्धि होनेतक ही लोग बन्धुता (सौहार्द) प्रकट करेंगे। संन्यासी भी मित्र आदिके स्नेह-सम्बन्धसे बँधे रहेंगे और अन्न-संग्रहके लिये लोगोंको चेले बनायेंगे। स्त्रियाँ दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती हुई बड़ोंकी तथा पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन करेंगी। जिस समय द्विज पाखण्डी लोगोंका साथ करके पाखण्डपूर्ण बातें करनेवाले हो जायँगे, उस समय कलियुगका वेग और बढ़ेगा। जब द्विज-जातिकी प्रजा यज्ञ और होम करना छोड़ देगी, उसी समयसे