भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 770 में से

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पृष्ठ 202
२००* संक्षिप्त नारदपुराण *

'ब्रह्मन्! आप प्रसन्न होइये और बताइये, मेरा हितसाधन करनेके लिये यहाँ पधारे हुए आप कौन हैं? आपके इन वचनोंको सुनकर मेरा सम्पूर्ण मोह नष्ट हो गया है।'

ऋभु बोले— द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हारा आचार्य ऋभु हूँ और तुम्हें तत्त्वको समझनेवाली बुद्धि देनेके लिये यहाँ आया था। अब मैं जाता हूँ। जो कुछ परमार्थ है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। इस प्रकार परमार्थ-तत्त्वका विचार करते हुए तुम इस सम्पूर्ण जगत्को एकमात्र वासुदेवसंज्ञक परमात्माका स्वरूप समझो। इसमें भेदका सर्वथा अभाव है।

ब्राह्मण जड़भरत कहते हैं— तदनन्तर निदाघने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुदेवको प्रणाम किया और बड़ी भक्तिसे उनकी पूजा की। तत्पश्चात् वे निदाघकी इच्छा न होनेपर भी वहाँसे चले गये। नरेश्वर! तदनन्तर एक सहस्र दिव्य वर्ष बीतनेके बाद गुरुदेव महर्षि ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश करनेके लिये पुनः उसी नगरमें आये। उन्होंने नगरसे बाहर ही निदाघको देखा। वहाँका राजा बहुत बड़ी सेना आदिके साथ धूम-धामसे नगरमें प्रवेश कर रहा था और निदाघ मनुष्योंकी भीड़-भाड़से दूर हटकर खड़े थे। वे जंगलसे समिधा और कुशा लेकर आये थे और भूख-प्याससे उनका गला सूख रहा था। निदाघको देखकर ऋभु उनके समीप गये और अभिवादन करके बोले—'बाबाजी! आप यहाँ एकान्तमें कैसे खड़े हैं?'

निदाघ बोले— विप्रवर! आज इस रमणीय नगरमें यहाँके राजा प्रवेश करना चाहते हैं। अतः यहाँ मनुष्योंकी यह बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी है। इसीलिये मैं यहाँ खड़ा हूँ।

ऋभुने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! आप यहाँकी बातोंके जानकार मालूम होते हैं। अतः बताइये, यहाँ राजा कौन है और दूसरे लोग कौन हैं?

निदाघ बोले— यह जो पर्वतशिखरके समान ऊँचे और मतवाले गजराजपर चढ़ा हुआ है, वही राजा है और दूसरे लोग उसके परिजन हैं।

ऋभुने पूछा— महाभाग! मैंने हाथी तथा राजाको एक ही साथ देखा है। आपने विशेषरूपसे इनका पृथक्-पृथक् चिह्न नहीं बताया; इसलिये मैं पहचान न सका। अतः आप इनकी विशेषता बतलाइये। मैं जानना चाहता हूँ कि इनमें कौन राजा है और कौन हाथी?

निदाघ बोले— ब्रह्मन्! इनमें यह जो नीचे है, वह हाथी है और इसके ऊपर ये राजा बैठे हैं। इन दोनोंमें एक वाहन है और दूसरा सवार। भला, वाह्य-वाहक-सम्बन्धको कौन नहीं जानता?

ऋभुने पूछा— ब्रह्मन्! जिस प्रकार मैं अच्छी तरह समझ सकूँ, उस तरह मुझे समझाइये। 'नीचे' इस शब्दका क्या अभिप्राय है और 'ऊपर' किसे कहते हैं?

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