भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २०९

लोग 'दीप्ता' की ही स्थिति मानते हैं। अनुदात्तमें 'मृदु' श्रुति जाननी चाहिये। गान्धर्व गानमें श्रुतिका अभाव होनेपर भी स्वरको ही श्रुतिके समान करना चाहिये, वहाँ स्वरमें ही श्रुतिका वैभव निहित है। उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचय¹ तथा निघात²—ये पाँच स्वरभेद होते हैं।

इसके बाद मैं आर्चिकके तीन स्वरोंका प्रतिपादन करता हूँ। पहला उदात्त, दूसरा अनुदात्त और तीसरा स्वरित है। जिसको उदात्त कहा गया है, वही स्वरितसे परे हो तो विद्वान् पुरुष उसे प्रचय कहते हैं। वहाँ दूसरा कोई स्वरान्तर नहीं होता। स्वरितके दो भेद हैं—वर्ण-स्वार तथा अतीत-स्वार। इसी प्रकार वर्ण भी मात्रिक एवं उच्चरितके पश्चात् दीर्घ होता है। प्रत्यय-स्वारूप प्रत्ययका दर्शन होनेसे उसे सात प्रकारका जानना चाहिये। वह क्या, कहाँ और कैसा है, इसका ज्ञान पदसे प्राप्त करना चाहिये। दाहिने कानमें सातों स्वरोंका श्रवण करावे। आचार्योंने पुत्रों और शिष्योंके हितकी इच्छासे ही इस शिक्षाशास्त्रका प्रणयन किया है। उच्च (उदात्त)-से कोई उच्चतर नहीं है और नीच (अनुदात्त)-से नीचतर नहीं है। फिर विशिष्ट स्वरके रूपमें जो 'स्वार' संज्ञा दी जाती है, उसमें स्वारका क्या स्थान है? (इसके उत्तरमें कहते हैं—) उच्च (उदात्त) और नीच (अनुदात्त)-के मध्यमें जो 'साधारण' यह श्रुति है, उसीको शिक्षाशास्त्रके विद्वान् स्वार-संज्ञामें 'स्वार' नामसे जानते हैं। उदात्तमें निषाद और गान्धार स्वर हैं, अनुदात्तमें ऋषभ और धैवत स्वर हैं। और ये—षड्ज, मध्यम तथा पञ्चम—स्वरितमें प्रकट होते हैं। जिसके परे 'क' और 'ख' हैं तथा जो जिह्वामूलीयरूप प्रयोजनको सिद्ध करनेवाली है, उस 'ऊष्मा' (ᳵक ᳵख)—को 'मात्रा' जाने। वह अपने स्वरूपसे ही 'कला' है (किसी दूसरे वर्णका अवयव नहीं है। इसे उपध्मानीयका भी उपलक्षण मानना चाहिये)।

जात्य, क्षैप्र, अभिनिहित, तैरोव्यञ्जन, तिरोविराम, प्रश्लिष्ट तथा सातवाँ पादवृत्त—ये सात स्वार हैं। अब मैं इन सब स्वारोंका पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ। लक्षण कहकर उन सबके यथायोग्य उदाहरण भी बताऊँगा। जो अक्षर 'य' कार और 'व' कारके साथ स्वरित होता है तथा जिसके आगे उदात्त नहीं होता, वह 'जात्य' स्वार कहलाता है। जब उदात्त 'इ' वर्ण और 'उ' वर्ण कहीं पदादि अनुदात्त अकार परे रहते सन्धि होनेपर 'य' 'व' के रूपमें परिणत हो स्वरित होते हैं, तो वहाँ सदा 'क्षैप्र' स्वारका लक्षण समझना चाहिये। 'ए' और 'ओ' इन दो उदात्त स्वरोंसे परे जो वकारसहित अकार निहित (अनुदात्तरूपमें निपातित) हो और उसका जहाँ लोप ('ए' कार या 'उ' कार में अनुप्रवेश) होता है, उसे 'अभिनिहित' स्वार माना जाता है। छन्दमें जहाँ कहीं या जो कोई भी ऐसा स्वरित होता है, जिसके पूर्वमें उदात्त हो, तो वह सर्व बहुस्वार—(सर्वत्र बहुलतासे होनेवाला स्वर) 'तैरोव्यञ्जन' कहलाता है। यदि उदात्त अवग्रह हो और अवग्रहसे परे अनन्तर स्वरित हो तो उसे 'तिरोविराम' समझना चाहिये। जहाँ उदात्त 'इ' कारको अनुदात्त 'इ' कारसे संयुक्त देखो, वहाँ विचार लो कि 'प्रश्लिष्ट' स्वार है। जहाँ स्वर अक्षर अकारादिमें स्वरित हो और पूर्वपदके साथ


१-स्वरितसे आगे स्वरित ही हों तो उनकी 'प्रचय' संज्ञा होती है। २- प्रचय परे हो तो स्वरितका आहनन होनेसे उसकी 'निघात' संज्ञा होती है। प्रचय न हो, तब तो शुद्ध 'स्वरित' ही रहता है।

संक्षिप्त नारद पुराण · पृष्ठ 211, कुल 770 में से · BharatKosha