भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 770 में से

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पृष्ठ 228

२२६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


है; जहाँ प्रतिपदिकके अतिरिक्त लिङ्ग^१, परिमाण^२ और वचन^३ आदिका बोध कराना हो, वहाँ भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। उक्त^४ कर्ममें (जहाँ कर्म वाच्य हो, उसमें) तथा उक्त कर्तामें^५ (जहाँ कर्ता वाच्य हो, उसमें) भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। धातु और प्रत्ययसे रहित सार्थक शब्दकी प्रातिपदिक^६ संज्ञा होती है॥ ३॥

अमौशसो द्वितीया स्यात् तत्कर्म क्रियते च यत्।
द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरान्तरेण संयुते ॥ ४॥

अम्, औ, शस्—यह द्वितीया विभक्ति है (यहाँ भी 'अम्' आदिको क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन समझना चाहिये)। जो किया जाता है, उसे कर्म कहते हैं। अनुक्त^७ कर्ममें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग कहा गया है (कर्तृवाच्य वाक्योंमें कर्म अनुक्त होता है, वहाँ उसकी प्रधानता नहीं रहती, इसीलिये उसे 'अनुक्त' कहा गया है)। 'अन्तरा', 'अन्तरेण' इन शब्दोंका जिसके साथ संयोग या अन्वय हो, उस शब्दमें द्वितीया विभक्तिका^८ प्रयोग करना चाहिये ॥ ४॥

टाभ्याम्भिसस्तृतीया स्यात् करणे कर्तरिरीता।
येन क्रियते तत्करणं स कर्ता स्यात्करोति यः ॥ ५॥

'टा', 'भ्याम्', 'भिस्'—यह तृतीया विभक्ति है (यहाँ भी पूर्ववत् एकवचन आदिका विभाग समझना चाहिये)। करणमें^९ और अनुक्त^१० कर्तामें तृतीया विभक्ति बतायी गयी है। जिसकी सहायतासे कार्य किया जाता है, उसका नाम करण है और जो कार्य करता है, उसे कर्ता कहते हैं (जिस वाक्यमें कर्मकी प्रधानता होती है, वहाँ कर्ता अनुक्त माना गया है) ॥ ५॥

ङेभ्याम्भ्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके।
यस्मै दित्सां धारयेद्द्वै रोचते सम्प्रदानकम् ॥ ६ ॥

'ङे', 'भ्याम्', 'भ्यस्'—यह चतुर्थी विभक्ति है। इसका प्रयोग सम्प्रदान कारकमें होता है। जिस व्यक्तिको कोई वस्तु देनेकी इच्छा मनमें धारण की जाय, उसकी 'सम्प्रदान^११' संज्ञा होती है तथा जिसको कोई वस्तु रुचिकर प्रतीत होती है, वह भी सम्प्रदान^१२ है (सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है) ॥ ६॥


१. 'तटः', 'तटी', 'तटम्'। २. परिमाणका उदाहरण 'द्रोणो व्रीहिः' (एक दोन धान है) इत्यादि है। ३. 'एकः', 'द्वौ', 'बहवः'। ४. 'हरिः सेव्यते' (श्रीहरि भक्तोंद्वारा सेवित होते हैं), 'लक्ष्म्या सेवितः' (भगवान् विष्णु लक्ष्मीद्वारा सेवित हैं) इत्यादि। ५. 'रामः करोति' (राम करते हैं)। ६. धातुसे रहित इसलिये कहा गया कि 'अहन्' इत्यादि पदोंमें प्रातिपदिक संज्ञा होकर 'न' लोप न हो जाय। प्रत्ययरहित कहनेका कारण यह है कि 'हरिषु', 'करोषि' इत्यादिमें भी 'सु' की प्रातिपदिक संज्ञा न हो जाय। यदि प्रातिपदिक संज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक एकवचन लाकर पदसंज्ञा करनेपर उक्त उदाहरणोंमें दन्त्य 'स' के स्थानमें 'मूर्धन्य 'ष' नहीं हो पाता; क्योंकि पदादि 'स' कारके स्थानमें 'ष' कार होनेका निषेध है। प्रत्ययके निषेधसे प्रत्ययान्तका भी निषेध समझना चाहिये। इससे 'हरिषु' इत्यादि समुदायकी प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होगी। सार्थक शब्दकी ही प्रातिपदिक संज्ञा होती है, निरर्थककी नहीं। इसलिये 'धनम्, वनम्' इत्यादिमें प्रत्येक अक्षरकी अलग-अलग 'प्रातिपदिक' संज्ञा नहीं हो सकती।
७. 'हरिं भजति' (श्रीहरिको भजता है)। इत्यादि वाक्योंमें 'हरि' इत्यादि पद अनुक्त है; इसलिये उनमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग होता है। ८. इसका उदाहरण है 'अन्तरा त्वां मां हरिः' (तुम्हारे और मेरे भीतर भी भगवान् हैं)। 'अन्तरेण हरिं न सुखम्' (भगवान्के बिना सुख नहीं है) इत्यादि। ९-१०. 'रामेण बाणेन हतो वाली' (श्रीरामने बाणसे वालीको मारा) इस वाक्यमें राम अनुक्त कर्ता हैं और बाण करण। अतः इन दोनोंमें तृतीया विभक्तिका प्रयोग हुआ है। ११. 'ब्राह्मणाय गां ददाति' (ब्राह्मणको गाय देता है) इस वाक्यमें ब्राह्मण सम्प्रदान है, इसलिये उसमें चतुर्थी हुई है। १२. इसका उदाहरण है—'हरये रोचते भक्तिः' (भगवान्को भक्ति पसंद है)।

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