भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

२३० * संक्षिप्त नारदपुराण *


है। क्रियावाचक 'भू' 'वा' आदि शब्द ही तिङ् विभक्तियोंके साथ संयुक्त होनेपर तिङन्त कहे गये हैं। इनमें दस^१ लकार बताये गये हैं॥ १७॥

तिप्तसन्तीति प्रथमो मध्यः सिप्थस्थ उत्तमः।
मिब्वस्मसः परस्मै तु पदानां चात्मनेपदम्॥ १८॥

(प्रत्येक लकारमें परस्मैपद और आत्मनेपद—ये दो पद होते हैं। प्रत्येक पदमें प्रथम, मध्यम और उत्तम—ये तीन पुरुष होते हैं।) 'तिप्' 'तस्' 'अन्ति' यह प्रथम पुरुष है। 'सिप्' 'थस्' 'थ'—यह मध्यम पुरुष है तथा 'मिप्' 'वस्' 'मस्' यह उत्तम पुरुष है (प्रत्येक पुरुषमें जो तीन-तीन प्रत्यय हैं, वे क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन हैं)। ये सब परस्मैपदके प्रत्यय हैं। अब आत्मनेपद बताया जाता है॥ १८॥

ते आतेऽन्ते प्रथमो मध्यः से आथे ध्वे तथोत्तमः।
ए वहे मह आदेशा ज्ञेया ह्यन्ये लिडादिषु॥ १९॥

'ते' 'आते' 'अन्ते' यह प्रथम पुरुष है। 'से' 'आथे' 'ध्वे' यह मध्यम पुरुष है। 'ए' 'वहे' 'महे' यह उत्तम पुरुष है। ये 'लट्' लकारके स्थानमें होनेवाले आदेश हैं। 'लिट्' आदि लकारोंके स्थानमें होनेवाले प्रत्ययरूप आदेश दूसरे हैं, उन्हें (अन्य व्याकरणसम्बन्धी ग्रन्थोंसे) जानना चाहिये॥ १९॥

नाम्नि प्रयुज्यमाने तु प्रथमः पुरुषो भवेत्।
मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि॥ २०॥

जहाँ 'युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंके अतिरिक्त अन्य कोई भी नाम (संज्ञा-शब्द) उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें प्रयुक्त होता हो, वहाँ प्रथम पुरुष होता है। 'युष्मद्' शब्द उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें प्रयुक्त हो तो मध्यम पुरुष होता है और 'अस्मद्' शब्दका उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें प्रयोग हो तो उत्तम पुरुष कहा गया है॥ २०॥

भूवाद्या धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः।
लडीरितो वर्तमाने भूतेऽनद्यतने तथा॥ २१॥
मास्मयोगे च लङ्वाच्यो लोडाशिषि च धातुतः।
विध्यादौ स्यादाशिषि च लिङित्तो द्विविधो मुने॥ २२॥

क्रिया-बोधक 'भू' 'वा' आदि शब्दोंको 'धातु' कहा गया है। 'सन्'^२ आदि प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु संज्ञा है। धातुओंसे वर्तमानकालमें लट्लकारका विधान है। अनद्यतन (आजसे पहलेके) भूतकालमें लङ् लकार होता है तथा 'मा' और 'स्म' इन दोनोंके योगमें लङ् (और लुङ्) लकार होता है, यह बताना चाहिये। आशीर्वाद और विधि^३ आदि अर्थमें धातुसे लोट् लकारका विधान है। विधि आदि अर्थमें तथा आशीर्वादमें लिङ् लकारका भी प्रयोग होता है, किंतु विधिलिङ् और आशिष्-लिङ्के धातुरूपोंमें अन्तर होता है। मुने! इसीलिये वह दो प्रकारका माना गया है॥ २१-२२॥

लिडतीते परोक्षे स्याच्छ्वस्तने लुट् भविष्यति।
स्यादेवाद्यतने लृट् च भविष्यति तु धातुतः॥ २३॥

परोक्ष भूतकालमें लिट् लकारका प्रयोग होता है। आजके बाद होनेवाले भविष्यमें 'लुट्'का प्रयोग किया जाता है। आज होनेवाले भविष्यमें (तथा सामान्य भविष्यकालमें भी) धातुसे लृट् लकार होता है॥ २३॥


१. लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्, लङ्, लिङ्, लुङ् तथा लृङ्—ये दस लकार हैं। इनमेंसे पाँचवें लकारका प्रयोग केवल वेदमें होता है।
२. सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यङ्, क्यष्, आचारक्विप्, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ् तथा णिङ्—ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं। ३. विधि (प्रेरणा या आज्ञा), निमन्त्रण (श्राद्ध आदिमें नियुक्ति या न्योता), आमन्त्रण (इच्छानुसार आज्ञा देना) तथा अधीष्ट (सत्कारपूर्ण व्यवहार)—इनको विध्यादि कहते हैं।