संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
कन्का लोप होनेपर एकः। इन सबका अर्थ— अकेला, असहाय है। चर्मण्वती एक नदीका नाम है। (इसमें चर्मन् शब्दसे मतुप्, मकारका वकारादेश, नलोपका अभाव और णत्व आदि कार्य निपातसिद्ध हैं। स्त्रीलिङ्गबोधक ङीप् प्रत्यय हुआ है)। 'ज्योत्स्ना' और 'तमिस्रा' निपात-सिद्ध हैं, यह बात गोमीके प्रसङ्गमें कही गयी है। इसी प्रकार अष्ठीवत्, कक्षीवत्, रुमण्वत्, आसन्दीवत् तथा चक्रीवत्—ये शब्द भी निपात-सिद्ध हैं। यथा—आसन्दीवान् ग्रामः, अष्ठीवान् नाम ऋषिः, चक्रीवान् नाम राजा, कक्षीवान् नाम ऋषिः, रुमण्वान् नाम पर्वततः। तूष्णीं शब्दसे काम् प्रत्यय होता है, अकच्के प्रकरणमें। तूष्णीकाम् आस्ते (चुप बैठता है)। मित् कार्य अन्तिम स्वरके बाद होता है। तिङन्त, अव्यय और सर्वनामसे 'टि' के पहले अकच् होता है, चकार इत्संज्ञक है। इस नियमके अनुसार 'जल्पति' इस तिङन्त पदके इकारसे पहले अकच् होनेसे 'जल्पतकि' (बोलता है) रूप बनता है॥ ६६—७०॥
कंवः कम्भश्च कंयुश्च कन्तिः कन्तुस्तथैव च।
कन्तः कंयश्च शंवश्च शम्भः शंयुस्तथा पुनः ॥ ७१ ॥
शन्तिः शन्तुः शन्तशंयौ तथाहंयुः शुभंयुवत् ।
कम् और शम्—ये मकारान्त अव्यय हैं। कम्का अर्थ जल और सुख है, शम्का अर्थ सुख है। इन दोनोंसे सात प्रत्यय होते हैं—व, भ, युस्, ति, तु, त और यस्। युस् और यस्का सकार इत्संज्ञक है। इन सबके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं— कंवः, कम्भः, कंयुः, कन्तिः, कन्तुः, कन्तः, कंयः। शंवः, शंभः, शंयुः, शन्तिः, शन्तुः, शन्तः, शंयः। अहम्—यह मकारान्त अव्यय अहंकारके अर्थमें प्रयुक्त होता है और शुभम्—यह मकारान्त अव्यय शुभ-अर्थमें है। इनसे 'युस्'-प्रत्यय होता है, सकार इत्संज्ञक है। अहम्+यु=अहंयुः (अहंकारवान्), शुभम्+यु= शुभंयुः (शुभयुक्त पुरुष) ॥ ७१ ॥
भवति बभूव भविता भविष्यति भवतद्भवद्वेच्चापि ॥ ७२ ॥
भूयादभूद्भविष्यल्लादावेतानि रूपाणि।
अत्ति जघासात्तात्स्यत्त्वाद्दद्यादद्विरघसदात्स्यत् ॥ ७३ ॥
(अब तिङन्तप्रकरण प्रारम्भ करके कुछ धातुओंके रूपोंका दिग्दर्शन कराते हैं। वैयाकरणोंने दस प्रकारके धातु-समुदाय माने हैं, उन्हें 'नवगणी या दसगणी' के नामसे जाना जाता है। उनके नाम हैं—भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्र्यादि तथा चुरादि। भ्वादिगणके सभी धातुओंके रूप प्रायः एक प्रकार एवं एक शैलीके होते हैं, दूसरे-दूसरे गणोंके धातु भी अपने-अपने ढंगमें एक ही तरहके होते हैं। यहाँ सभी गणोंके एक-एक धातुके नौ लकारोंमें एक-एक रूप दिया जाता है। शेष धातु और उनके रूपोंका ज्ञान विद्वान् गुरुसे प्राप्त करना चाहिये।) 'भू' धातुके लट् लकारमें 'भवति भवतः भवन्ति' इत्यादि रूप बनते हैं। लिट् लकारमें 'बभूव बभूवतुः बभूवुः' इत्यादि, लुट्में 'भविता भवितारौ भवितारः' इत्यादि, लृट्में 'भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति' इत्यादि, लोट्में 'भवतु भवतात् भवताद्, भवताम् भवन्तु इत्यादि, लङ्लकारमें 'अभवत् अभवताम् अभवन्' इत्यादि। विधिलिङ्में 'भवेत् भवेताम् भवेयुः' इत्यादि, आशिष् लिङ्में भूयात् 'भूयास्ताम् भूयासुः' इत्यादि लुङ्में 'अभूत् अभूताम् अभूवन्' इत्यादि तथा लृङ् लकारमें 'अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन्' इत्यादि—ये सब रूप होते हैं। 'भू' धातुका अर्थ सत्ता है, 'भवति'का अर्थ 'होता है'—ऐसा किया जाता है। अब अदादि गणके 'अद्' धातुका पूर्ववत् प्रत्येक लकारमें एक-एक रूप दिया जाता है, 'अद्' धातु भक्षण अर्थमें प्रयुक्त होता है। अत्ति। जघास। अत्ता। अत्स्यति। अत्तु। आदत्। अद्यात्। अद्यात्। अघसत्। आत्स्यत् ॥ ७२-७३ ॥
जुहोति जुहाव जुहवाञ्चकार होता होष्यति जुहोतु।
अजुहोज्जुहुयाद्दूयादहौषीदहोष्यद्धीव्यति ।
दिदेव देविता देविष्यति दीव्यतु चादीव्यद्दीव्येद्दीव्याद्वै ॥ ७४ ॥